Thursday, December 15, 2016

मैं ओट ले लेता हूँ ( I take cushion )

जब कभी झूठ बोलता हूँ तो
औचित्यपूर्णता की ओट ले लेता हूँ
जब अपना हित साधता हूँ
तो बुद्धिजीविता की ओट ले लेता हूँ
दूसरों को जो करने देने से रोकता हूँ
फिर अपने वही शुरू करता हूँ
जब देश बनाता हूँ
तो अपने नागरिकों की ओट ले लेता हूं।
जब मेरा षडयन्त्र और चालें पकड़ी जाती हैं तो
मैं मैकियाविली, चाणक्य और हाॅब्स की ओट ले लेता हूं
मानवता का हनन करता हूं तो
राष्ट्ररक्षा की ओट ले लेता हूं
किसी की हत्या करता हूं तो
आत्म रक्षा की ओट ले लेता हूं
हर समय संदर्भ और परिस्थितियां बदलती रहती हैं
उसी तरह ओट लेने के मेरे तरीके भी बदलते रहते हैं।।
मैं दूसरों को हतोत्साहित भी करता हूं, उत्साहित भी करता हूं
लालायित भी करवाता हूं
अश्लील बनता हूं, अश्लीलता फैलाता हूं
फिर फैशन की ओट ले लेता हूं
दकियानूसी विचार फैलाता हूं
फिर संस्कृति और परम्परा की ओट ले लेता हूं
जब अक्षम्य गलतियां करता हूं तो
दुनियावी प्रायश्चितता की ओट ले लेता हूं
दलितों ,दमितों , शोषितों को बेघर करता हूं तो
बाजार और विकास की ओट ले लेता हूं
अपने अनुकूल सामाजिक व्यवस्था बनाता हूं
और यथास्थिति की ओट ले लेता हूं
दोस्तों इसी तरह ओट लेकर मैं जीतता रहता हूं
जीवन के इस रहस्य को मैं अपनी अगली पीढ़ी में डालता हूँ
और अगर वह असहमति जताते हैं तो
आपने उम्रदराज अनुभवों की ओट ले लेता हूं।
मुझे पाखण्डी कहलाने का खतरा है
इसीलिए मैने कई तरह की ओटों को ईजाद किया है।

Thursday, October 20, 2016

जब बापू मेरा पगलाता है।

जब बापू मेरा पगलाता है।

घर में भाई बहनों के संग मेरी भी बैंड बजाता है।
जब हम कुछ नया अगर सोंचे
तो हमको नादान बताता है
हर नये काम में अक्सर वह
बुनियादी कमी बताता है
जब बापू मेरा पगलाता है।

बाइक और कार की चाबी वह
लगी छोड़ कर आता है
फिर अगली सुबह ना मिलने पर
मेरे उपर चिल्लाता है।
जब बापू मेरा पगलाता है।

उसकी मर्जी के अलग कहीं
गर खाने में कुछ बन जाता है
मेरी माँ के मुँह पर तब वह
थाली को राॅकेट बनाता है।
जब बापू मेरा  पगलाता है।।

सारे बेहूदा कामों को वो
मेरे जिम्मे कर जाता है
उसके चक्कर मेें मेरा सब
टाइम खराब हो जाता है।
जब बापू मेरा पगलाता है।।
काम खत्म हो जाने पर
जब दफतर से घर वो आता है
दूजों से पैसे माँग के वह
एक दारू की बोतल लाता है
खाने से पहले उसमें से दो
पटियाला पैग बनाता है
जब बापू मेरा पगलाता है।।

फिर मेरी माँ के उपर वह
पूरे दम से चिल्लाता है
जब बापू मेरा पगलाता है।।

सपने तू चला जा

सपने तू चला जा अब मैं तेरा पीछा नहीं करूंगा

घर पे माँ अकेली है मेरी
अब उसके साथ रहूँगा
उसकी गोदी में सर रखकर
अब जोर-जोर रोउँगां
सपने तू चला जा अब मैं तेरा पीछा नहीं करूँगां।।

पापा के आॅफिस में जाकर
अब उनसे गले मिलूँगा
अपनी सारी नादानी की
उनसे माफी मागूंगा
सपने तू चला जा अब मैं तेरा पीछा नहीं करूंगा
तेरा पीछा करते-करते
मेरे कितने अपने छूटे
चुन चुन के उन रिश्तों के
अब मैं सारे कर्ज भरूंगा
सपने तू चला जा अब मैं तेरा पीछा नहीं करूंगा।।

झूठे सारे किस्से हैं
पर ढ़ब से बनाये गये हैं
बुनियाद खोखली हो जिसकी
मैं वो किस्सा नहीं बनूंगा
सपने तू चला जा अब मैं तेरा पीछा नहीं करूंगा
घर में माँ अकेली है मेरी
मैं उसके साथ रहूंगा।।

जो भी तुझसे शिकवे थे
अब सब वापस ले लूंगा
उनको इक कलश में रखकर
गंगा में विसर्जित करूंगा ।।
सपने तू चला जा अब मैं तेरा पीछा नहीं करूंगा

तुझको पाने को अब तक
कितनी रातें जागी हैं
अब पीछा छोड़ के तेरा
मैं चैन की नींद सोउंगा
तू नहीं मिला तो क्या है ?
फिर भी बिंदास जिऊंगा
सपने तू चला जा अब मैं तेरा पीछा नहीं करूंगा।।

माँ’


दुनिया मेरे पीछे पड़ी
पर संग मेरे थी माँ खड़ी
सर पे मेरे रख हाथ वो
कितनी ही रातों को जगी

जो भी मेरे से जब भिड़ा
माँ मेरी उससे लड़ पड़ी
मैं जो गलत भी करता था
उसके लिए था सब सही

एक दिन मुझे पुचकारकर
बोली वो चल नन्हें बड्डी
गिरने से तू डरना नहीं
पीछे हूँ मैं तेरे खड़ी
उसकी इजाजत के बिना
जो कुछ हुआ ना हुआ सही
मैं सोचता हूँ आज भी
माँ थी मेरी कितनी बड़ी

किस्मत मेरी तू ये बता
मेरी माँ छुपा के कहाँ रखी
क्या तुझे भी माँ कमी खली

महसूस मैं करता हूँ जैसे
माँ मेरी है यहीं कहीं
माँ मेरी सबसे बड़ी ।।



वो हुक्का पीकर आती थी

देहरादून की घाटी थी
अपने काॅलेज में ज्यादातर
वो लेट लतीफ ही आती थी
एक दिन मैंने देखा उसको
वो हुक्का पीकर आती थी

पीछा करने वाले को वह
पूरा कैम्पस घुमवाती थी
पर फिर भी हाथ ना आती थी।
इसी बीच में कभी-कभी वह ’हर्ले’ पे बैठ के आती थी।
रेसिंग करने वालों की फिर घिघ्घी सी बँध जाती थी
वह हुक्का...........


घण्टाघर के मार्केट में
वह शार्ट्स पहन के आती थी
गोरी चिट्टी  चमड़ी उसकी
लोगों का दिल सुलगाती थी
देहरादून की घाटी थी
वह हुक्का पीकर आती थी।।


जब रात वहाँ हो जाती थी
हाॅस्टल के छत पर वो जाती थी।
दो बोतल बीयर गटका के
खाली बोतल लुढ़काती थी
वह हुक्का पीकर आती थी
देहरादून की घाटी थी।।

Wednesday, October 19, 2016

खुद्दारी

अपने पैरों पे होके खड़ा जब तक ना सब को दिखायेगा बिन पात्र दिखे सबके सम्मुख तू ऐसे ठोकर खायेगा ।। अपने पैरों.........
अब मदद मांगना छोड़ के तू खुद में ऐसा परिवर्तन कर कि जाने तुझको लोग सभी वरना ऐसे पछतायेगा ।। अपने पैरों..........

सब उगते सूरज से हरदम रोशनी चुराते रहते हैं अपने अन्दर कुछ जला दे वो जिससे सूरज ढ़क जायेगा ।। अपने पैरों पे होके खड़ा जब तक ना सबका दिखायेगा।।

सब वक्त के साथ बदलते हैं तू किसको अपना बतायेगा गर चिन्ता इसकी छोड़ दे तू तो पक्का कुछ कर जायेगा ।। अपने पैरों.......... जब तक ना सबको दिखायेगा।।

मेरा प्यारा यार चुप

एक चुप हजार चुप
वह था बार-बार चुप
हर तरह की हलचलों पे
मेरा प्यारा यार चुप
एक चुप...........


आत्मा से जल रहा था
दर्द से पिघल रहा था
मौत पास आ गयी
पता उसे ये चल रहा था
साथ में खड़ा अधेरा
उसको लीलता था घुप
एक चुप हजार चुप
वह था बार-बार चुप


लक्ष्य के मुहाने पर
पहुँच चुका था वो तुरूप
आत्मा ने बोला तब
फायदा नहीं है अब कुछ
एक चुप......
वह था बार-बार चुप ।।

Tuesday, October 18, 2016

हर इक पल कुछ ढ़ल जाता हूँ

क्यों मैं ये समझ ना पाता हूँ
हर इक पल कुछ ढ़ल जाता हूँ
मानवता के अंगारों पर चलने पहले आ जाता हूँ
हर इक पल कुछ ढ़ल जाता हूँ


तेरे मेरे के नारों में
मैं सबक नारा लगाता हूँ
सच्चे झूठों की बहसों में क्यों
झूठा कहलाया जाता हूँ ।।
हर इक पल.......


जो साथ चले आये अब तक
अब भी उनको उकसाता हूँ
मत करना आत्मसमर्पण तुम
मैं पक्की बात बताता हूँ।।
हर इक पल मैं कुछ.........

चिनारों का शहर होगा

चिनारों का शहर होगा
उस बीच कहीं पर छोटा सा
नारंगी अपना घर होगा
रात और दिन से बेफिक्र वहीं
बहारों से लिपटा हर पहर होगा
चिनारों का शहर होगा।।


वहीं पास में बहता इक दरिया
हम जिसके किनारे बैठेंगे
तेरे गोद में हाथों के नीचे
पड़ा हुआ मेरा सर होगा।
चिनारों का शहर होगा।।


तेरी गोद मैं लेटे-लेटे जब
तेरे गालों पे उंगली फिराउँगा
यह सोच सिहर मैं जाता हूँ
क्या रूमानी मंजर होगा ।
चिनारों का शहर होगा ।।


मैं इत्रफरोश सा बैठूंगा
तेरे ऐहतराम की चाहत में
जब आयेगी तू फिर तो बस
तुझ से माहौल वो तर होगा ।
चिनारों का शहर होगा।।

गर मैं राजा बनूँगा कभी तो

गर मैं राजा बनूँगा कभी तो
नाम तेरा निसाबों में होगा
अपने बारे में चर्चा शहर के
सारे चर्चित खराबों में होगा ।।
गर मैं राजा.....

शब जो आये तो आने दो उसको
शामियाना तो आबाद होगा
गर अंधेरे ने जुर्रत करी तो
उसका लहू फिर चिरागों में होगा।।
गर मैं राजा......

लांघ जायेगें हम सारी हद को
खूबसूरत वो अगाज होगा
जो पहँुचना जहाँ चाहेगा फिर
पैरवी का ना मोहताज होगा।।
गर मैं राजा.....

फूलों से सब दुकाने भरेंगी
खुशबुओं का ही बाजार होगा
सब हाथ में हाथ डाले चलेंगें
न कत्ल का कोई औजार होगा।।
गर मैं राजा..........

Monday, October 17, 2016

’’उस कैफे में फिर आ जाना’’

’’उस कैफे में फिर आ जाना’’
गर मुझसे शिकायत करनी हो
उस कैफे में फिर आ जाना
जहां बैठ के तेरी बातों को
सुनता रहता था रोजाना।।
कितना अच्छा तब लगता था
तेरी आंखों में बस खो जाना
तेरे लबों की सुर्खी पे अक्सर
फिर कविता कोई बना जाना
उस कैफे में फिर आ जाना
गर मुझसे शिकायत करनी हो।।
उस कैफे में फिर आ जाना।।
मेरे प्रश्नों के उत्तर में
तेरे कन्धों का वो उचकाना
तेरी कोल्ड काॅफी के आर्डर पे
मेरा कुढ़कर के रह जाना
उस कैफे में फिर आ जाना।।
गर मुझसे.......
राजनीति की बातों पर
तेरा इंग्लिश में वो बतियाना
फिर मेरे रूमानी होने पर
अनभिज्ञ हो मुँह को बिचकाना
उस कैफे में फिर आ जाना।।
घंटो फयूचर प्लानिंग करना
मेरे दिल की हीलिंग करना
फिर मुझको नसीहत जीवन की
हलके-हलके से दे जाना
गालों पे लटके बालों को 
कानों पे फिर से चढ़ा जाना
उस कैफे में फिर आ जाना।।

Sunday, July 3, 2016

’इस्लाम’, ’हिन्दुत्व’ और ’भारतवाद’ की किचकिच -

अभी ढ़ाका में हुए चरमपंथी हमले को लेकर इस्लाम और मुसलमान पर एक बार फिर सवाल उठ खड़े हुए हैं। यह बात ठीक है कि बांग्लादेश में कट्टर मुस्लिमों को जब से फाँसी पर चढ़ाया जाना शुरू हुआ है तब से इस तरह के हमले में तेजी आयी है। लेकिन फिर भी जो समझदार मुस्लिम युवा और अन्य मुस्लिम हैं उन्हें अब यह समझना चाहिए कि बिना बोले अब काम नहीं चलेगा। आप धीरे धीरे और थोड़ा ही बोलिये, लेकिन बोलिये। मैं भी बोलूंगा लेकिन मेरा बोलना ’हिन्दू’ होने की वजह से कूड़ेदान में डाल दिया जायेगा। बांग्लादेश जैसे देश में उदार मुस्लिम ब्लागर अगर इतने प्रभावी हो सकते हैं तो भारत में क्यों नहीं ?
आप सीरिया, अफगानिस्तान, ईराक में मुस्लिमों की आतंकी वारदातो के लिए अमेरिका को जिम्मेदार ठहरा सकते हैं और ये वाजिब भी होगा। लेकिन ईस्लाम के नाम पर इतना खून खराबा हो रहा है जैसे मानो इस्लाम का अस्तित्व खतरे में है।
पूरे विश्व में इस्लाम के मानने वालों की संख्या 1.6 बिलियन के साथ दूसरे नम्बर पर है। पहले नम्बर पर क्रिश्चियन 2.2 बिलियन है। क्या पूरे विश्व में मुस्लिम अपने आप को अल्पसंख्यक समझते हैं ? आईसिस की विचारधारा की पैरवी करने वाले ज्यादातर शिक्षित मुस्लिम युवा ही दिख रहें हैं। अखिर ये रिक्तता कहाँ पैदा हो रही है ?
जहाँ तक भारत की बात है तो ’समान नागरिक संहिता’ से लेकर ’तीन बार तलाक’ के मुद्दे तक मुस्लिम खुलकर सामने क्यों नहीं आ रहा है ? समान नागरिक संहिता पर अगर भाजपा और आरएसएस का षडयंन्त्र दिखता है तो आप उसका भंण्डाभोड कुछ वजनदार और वैज्ञानिक तर्कों से करिये ना कि बस अल्पसंख्यक होने और अनुच्छेद 25 और धर्म को मानने की स्वतंत्रता की आड़ लेकर। जितना आप चीजों को उलझाने के लिए संविधान के ’ग्रे एरिया’ का सहारा लेंगे उतना ही आप उलझते जायेंगे और ’अनिर्णय की स्थिति’ का शिकार होंगे। क्योंकि यहाँ पर हर कोई आपको उलझाने के लिए ही बैठा मिलेगा। समाधान कोई नहीं चाहता। समाधान निकलने से बहुत से लोग बेरोजगार हो जायेंगे।
ठीक उसी तरह अगर राम मन्दिर बन गया तो प्रवीण तोगड़िया से लेगर सुब्रहमण्यम स्वामी , विनय कटियार, और ना कितने साध्वियों और धर्म उद्धारकों की पब्लिसिटी की दुकान बन्द हो जायेगी और ना जाने कितने अकुशल लोगों का रोजगार छिन जायेगा जिन्हे केवल राम मन्दिर की ईटें तराशना आता है।
उसी तरह आप मुस्लिम लाॅ पर्सनल बोर्ड में आपके मुस्लिम धर्म के ठेकेदार जो बैठे हैं उन्हे जितनी जल्दी हो सके अप्रासंगिक साबित करिये। ये लोग दीमक हैं जो धीरे धीरे इस्लामियत और कुरान की सकारत्मकता को चाट रहें हैं। एक और बात यह है कि अगर कुरान में कुछ ऐसा लिखा है जो आज के समय में फिट नहीं बैठता तो उसको आगे बढ़कर खुलकर नकार दीजीये। ईस्लाम उससे समृद्ध ही होगा।

Tuesday, May 10, 2016

दारूण अनुनाद-

आरक्षण की बढ़ती माँग से हमारी राजनीति और नेताओं के चेहरे अपने-अपने हित को देखकर भले ही खिल रहे और मायूस हो रहे हों लेकिन देश अगर जीवंत रूप में होता तो इसकी हालत देख नहीं पाते हम लोग। आरक्षण जिस उद्देश्य से दिया गया वह तो वह पूरा होता दिख नहीं रहा है और इस समस्या के जितने विकल्प बुद्धिजीवियो और सिविल सोसाइटी के द्वारा दिखाये जा रहे है उनके नीति के रूप में नियमित होने की कोई गुंजाईश ही नहीं दिख रही है। सवाल आज इसका नहीं है कि आरक्षण सही है या गलत। सवाल ये है कि जो चल रहा है वह कितना सही और और कितना गलत है। आज राजनीतिज्ञों के लिए यह चै|रस का खेल बन गया है।
इस विमर्श को अब दलित और सवर्ण मानसिकता से हटकर एक नागरिक की मानसिकता से देखने की जरूरत है। क्योंकि हमारा शायद अन्तिम उद्देश्य भी सामान्य रूप से अपनी पहचान नागरिक के रूप में तय करने का है ना कि सवर्ण और दलित के रूप में। हाँ, जाति की हकीकत क्या है यह मुझे अच्छी तरह पता है। लेकिन फिर भी इस जातीय विदू्रपता के बावजूद हम एक नागरिक बनने के लक्ष्य से विमुख नहीं हो सकते। चाहे यह मार्ग अन्तहीन ही क्यों ना हो।
चाहे वह हरियाणा का जाट आन्दोलन हो, राजस्थान में गुर्जर, या हार्दिक पटेल के द्वारा आह्वानित किये जा रहे पटेलों की समस्या, इन सारे उदाहरणों से ऐसा लग रहा है कि मौजूदा समय में आरक्षण देने के जो भी उपक्रम हम कर रहे है उससे सामाजिक समता लाने का यह उपक्रम कहीं बैक फायर करके सामाजिक विषमता लाने का कार्य ना कर दे। ऐसा इसलिए क्योंकि धीरे-धीरे अन्य जो सशक्त जातियां और भी है सामाजिक-आर्थिक सूचकांक जिनका गड़बड़ा रहा है, उनमें अब सुगबुगाहट बढ़ती जा रही है। और सरकारी संपत्तियों को हानि पहुँचाकर अपनी बात सरकार से मनवाने वाली प्रेरणा देने के लिए हरियाणा के जाट और हमारे हार्दिक पटेल काफी है। तो मसला ये है कि सामाजिक विद्रोह के लिए जहाँ बस एक चिंन्गारी काफी है जबकि यहाँ तो बाकायदा ध्वजवाहक और मेन्टोर तैयार बैठे हैं आपको रास्ता दिखाने के लिए।
हल क्या है ?
1.हल के रूप में सबसे पहली जरूरत जो कदम उठाने की है वह यह कि एक ऐसा मानदंड निर्धारित हो जिसके तहत उन लोगों को या जातियों को निकाला जाय जिनकी सामाजिक और आर्थिक स्थ्तिि तय मानदंड के अनुरूप हो चुकी है। और निकालने का अर्थ यह ना हो कि हमेशा के लिए निकाल दिया जाय। जरूरत पड़ने पर फिर उनको सम्मिलित करने का रास्ता साफ हो।
2.यह तय करना बहुत जरूरी है कि आकड़े जाति के आधार पर लिये जाय या उनकी आर्थिक सामाजिक स्थिति को देखकर। जिसके भी आधार पर लिये जायें उसमें मेरे हिसाब से सामाजिक स्थ्तिि पर जोर और प्राथमिकता ज्यादा रहे।
3. हमारे दलित चिंतको और दलित विमर्शी मित्रों को यह विश्वास दिलाने की जरूरत है कि आरक्षण नीति की समीक्षा का मतलब आरक्षण का सफाया नहीं है। कोई भी गंभीर सरकार यह बचकाना कदम नहीं उठा सकती अगर भारत जैसे देश की सत्ता में आज के समय में बने रहना है तो। यह राजनीतिज्ञों की करतूतों से हम इतने घबरा जाते हैं।
4. सामाजिक स्थिति के आधार पर लाभ पहुँचाने की बात की जाती है यह तर्क दिया जाता है कि सामाजिक स्थिति निर्धारित करने का तरीका और विधि क्या होगी ? तो उसका जबाब यह है कि हाशिये पर खड़े समुदायों की कम से कम स्नातक स्तर तक शिक्षा, स्वाथ्य और घर की माकूल व्यवस्था करने की जो सरकारे खानापूर्ति करती है। इसको एक मार्केटिग कम्पैन की तरह चलाने की जरूरत है। और ठोस परिणाम निकलने हेतु सम्बन्धित अधिकारियों की कठोर जबाबदेही सुनिश्चित हो। जागरूकता ही इसकी कुंजी है।
5.सामाजिक स्थिति सुधारने का एक पक्ष यह भी है कि अगर आर्थिक हालात सुधरते है तो उसी अनुपात में सामाजिक स्थिति में भी सुधार होता है। क्योंकि आपकी आत्मनिर्भरता बढ़ती है। जहाँ गुलामी खत्म होती है।
6.जाति वाद, छुआछूत , नस्लवाद, भाई-भतीजावाद, आर्थिक एकाधिकारवाद , यह सब ’’सम्भ्रान्त असभ्यता ’’ के गुण है जिन्हे खोखली यथोचितता के आधार पर संस्कृति और व्यवहारिकता का जामा पहनाकर औचित्यपूर्ण ठहराया जाता है। इसलिए एक ऐसे अनवरत सामाजिक कैम्पैन की आवश्यकता है जो इन समूहो से आने वाली सभी आवाजो को हतोत्साहित करे। और सही दिशा में उनका प्रबोधन करें।

Sunday, March 13, 2016

मुझे शब्द दे दो मैं कहीं भी रह लूँगा

मुझे शब्द दे दो मैं कहीं भी रह लूँगा।
गिरि , खोह , वन प्रान्तर
कहीं भी ,
क्योंकि शब्दों के लिए मनुष्य जरूरी नहीं होते,
पेड़ पौधे पशु-पक्षाी -
वे भी समझते हैं कि हम उनकों कितना समझा पाते हैं,
इसिलिए मैं सारे कष्ट सह लूंगा , पर -
मुझे शब्द दे दो मैं कहीं भी रह लूंगा।।
जब से मानवों ने पेड़ों के जंगल काटने प्रारम्भ किये और
कंक्रीट के जंगल बनाये,
स्वार्थ हित पशुवध किया-
तब से इन्होंने बोलना बन्द कर दिया है-
मुझे इनके बीच कर दो मैं बात कर लूंगा,
पर मुझे शब्द दे दो मैं कहीं भी रह लूंगा।।
चाहूँ तो शब्दों से अकूत सम्पत्ति बटोर लूं,
इम्पोर्टेड गाडि़यों में चलूं,
पर यह शब्दों के साथ बलात्कार होगा,
और शब्द मेरे लिए अखण्ड, अनन्त और निष्प्रपंच हैं ,
मुझे वह बल दो प्रभु जिससे अपनी सत्ता को शब्द की सत्ता के साथा एकाकार कर सकूँ।
शब्द में विलीन हो जाऊँ
तभी मेरी मुक्ति है,
ले लो मैं सब कुछ दे दूगाँ, पर-
मुझे शब्द दे दो , मैं कहीं भी रह लूंगा।।


                                    लेखक- आशुतोष शुक्ल ’स्थाणु’

Saturday, March 12, 2016

मौका भी है दस्तूर भी , जवानी भी है फितूर भी।।


हमारे वामपंथी भाइयों की यह दलील कि वे दमित, शोषित, पिछड़े, कुचले लोंगों की बात करते हैं , अब धीरे-धीरे सन्देह पैदा करने लगी है। क्योंकि जितना मैंने वामपंथ को पढ़ा उससे यह समझ में आया कि वामपंथियों के लिए उनके समाजवादी राज्य का निर्माण करने वाले सपने के लिए अनुकूल परिस्थितियां भारत में थाल सजाकर बैठी हैं लेकिन यह लोग किस धारा में विचारमग्न हैं यह समझ नही आता।
नवम्बर 1917 में रूसी क्रन्ति के समय जारशाही का अन्त करने के लिए जब बोल्शेविक और मेन्शेविक दो साम्यवादी दल अपनी अलग-अलग राय के चलते अलग हो गये तो उसके पीछे की वजह यही थी कि बोल्शेविक जिसका नेता लेनिन था उसने कहा कि ’जारशाही’ के तख्ता पलट करने के सिवाय किसी और तरह से हमें उससे मुक्ति नहीं मिल सकती उसने कहा कि मजदूरों और किसानों को मिलाकर सैनिकों का एक ऐसा दस्ता तैयार करो जो अन्य लोंगो को क्रान्ति के लिए प्रेरित करे। लेनिन का मानना था कि - ’’ क्रान्ति होती नहीं क्रान्ति की जाती है।’’ लेकिन ठीक इसके विपरीत मेन्सेविकों का मानना था कि अभी हमारे (रूस के) किसान क्रान्ति के लिए तैयार नहीं है। मेन्सेविकों का मानना था समाजवाद का विकास क्रमिक रूप से बिना हिंसा के हो तो ज्यादा अच्छा है। लेकिन लेनिन कहता था कि क्रमिक रूप से विकास करने के चक्कर में ’हम अपने लोगों को पूँजीवादी व्यवस्था के कष्टों से क्यों गुजारें।’ इसलिए क्रान्ति कर दो।
अब आते हैं भारत के सन्दर्भ में । आज के मौजूदा परिदृश्य में समाजवादी (साम्यवादी) राज्य की स्थापना के लिए 1917 के रूस की तुुलना में ज्यादा मुफीद पस्थितियां है। जैसे कि आज हमारे किसान रोज आत्महत्या कर रहें हैं। हिन्दुस्तान डेली के मुताबिक जितनी मौते हमारे जवानों की आतंकवाद और कश्मीर पर सीमा सुरक्षित करने में नहीं हुई उससे ज्यादा जवान नक्सलियों के हाथों मार दिये गये। ये रिकार्ड 2015 में है। 1998 से लेकर 2015 तक लगभग पूरे देश में 12 या 1400000 लाख किसानों ने अपनी आत्महत्या कर ली। अर्थात् कहने का अर्थ यह है कि जो बुनियादी आधार एक वामपंथी राज्य बनाने तथा क्रान्ति के लिए चाहिए वो सब मौजूद है।
अभी सरकार ने जो लेबर कानून पास करने की बात कही है (शायद पास हो गया क्या) उसमें भी मजदूरों को यूनियन बनाने के अधिकार छीनने की बात की जा रही थी जिससे मैं भी सहमत नहीं हूँ। और भी कई क्लाॅज है उस कानून में जो मजदूरों के हित में नहीं है।
अर्थात् मेरी अपने वामपंथी साथियों से अपील है कि फल लटक रहें हैं जल्दी तोडो। फसल पक चुकी है। आप केवल जेएनयू में बैठकर बौद्धिक प्रलाप करेंगें इधर इतनी अच्छी मुफीद परिस्थितियां और क्रान्ति करने के सारे आधार नष्ट हो रहें हैं। सारे किसानों , मजदूरों और नक्सलियों को इकठ्ठा करो और टूट पड़ो मैदान में। लेनिन की तरह । गजब का बन्दा था। उसके बारे में चेम्बेरलेन ने कहा था कि- ’’नेपोलियन के बाद इतिहास का रूख मोड़ने वाला लेनिन जैसा दूसरा कोई नहीं पैदा हुआ।’’
( वैधानिक चेतावनी- कृपया इससे कोई आहत ना हो। और नक्सलियों और किसानो की समस्यायों को लेकर मैं उचित रूप से गंभीर हूँ )

बस परिप्रेक्ष्य का फेर है।

दुनिया में लगभग एक चैथाई हिस्से पर मुस्लिम आबादी निवास करती है। और जिस तरह से आतंकवाद को मुस्लिम समुदाय से जोड़ने का एक फैशन सा चल पड़ा है उसके पीछे की सबसे बड़ी वजह यह है कि कुछ यूरोपीय देश और अमेरिका इन दोनो ने परिप्रेक्षिक मोतियाबिन्द के हालात पैदा कर दिये है। मतलब अगर अमेरिका में कुछ गोरे लोगों की कोई काला अमेरिकी हत्या कर दे तो यह व्यक्तिगत उन्माद या उस व्यक्ति का पागलपन माना जाता है। अगर कोई गोरा आस्ट्रेलिया या अमेरिका में किसी पंजाबी या भारतीयों के गुरूद्वारे के सामने गोली चला दे यह उसकी व्यक्तिगत समस्या है। वही अगर कोई मुस्लिम यही काम कर दे तो इसे ’आतंकवाद’ कहा जाता है। क्या शिवसेना के इशारे पर उत्तर भारतीयों को मारना आतंकवाद के दायरे में नहीं लाया जा सकता ? दरअसल आतंकवाद की इस धुँधली और पारिभाषिक विदू्रपता का सहारा लेकर मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाया जा रहा इस तथ्य को नकारते हुए कि दुनिया में कितने मुस्लिम डाक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक और पता नहीं क्या-2 होंगे जिसे लोग अपनी नजर में अच्छे कामों मे गिनती करते हैं। इस बात पर बहस छिड़ते ही लोग मध्य एशिया में चल रहे उथल-पुथल को मुस्लिम और इस्लामिक कट्टरवाद की संज्ञा दे देते है। लेकिन यह एक घोर राजनीतिक समस्या है। यह ’सामरिक अर्थशास्त्र’ है जिसे अमेरिका और उसके मित्र देशों ने बड़े करीने से भुनाया है। । लोगों का ध्यान फ़्रांस में मारे गये चंद लोगो पर बड़ी आसानी से चला जाता है लेकिन फिलीस्तीन में मुस्लिमों को रोज मारा जा रहा है उस पर लोंगो का ध्यान नहीं जाता। ध्यान जाता है लेकिन अगर उसकी तरफदारी करेंगें तो सारे विकसित राष्ट्रों की दुश्मनी मोल लेनी पड़ेगी। दुनिया में कौन सा ऐसा देश है जो अपनी जमीन पर जबरदस्ती किसी दूसरी जाति (यहूदी) और देश का अधिग्रहण बर्दास्त करेगा, जैसा कि फिलीस्तीन भी नहीं कर पा रहा है। इससे बड़ा राजनीतिक शोषण इतिहास में नहीं मिलेगा।
अगर लोग यह कहते हैं कि जहाँ मुस्लिम है वहाँ समस्या है तो लोग इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे देशों के बारे में बात क्यों नहीं करते ? ये दोंनो ही समृद्ध देशों की श्रेणी में दिखते हैं। और शिया सुन्नी की बात की जाती है तो इस विवाद को भी इसलिए हवा मिली क्योंकि पश्चिमी देशों ने अपने हित को देखते हुए उसी मुस्लिम समुदाय के एक भाई का साथ दिया और दूसरे भाई के घर का जब चूल्हा नहीं जला और बेरोजगारी झेलनी पड़ी तो अपने भाई के संरक्षक से ज्यादा गुस्सा अपने भाई पर आया क्योंकि यह सब शिया के साथ के हो रहा था सुन्नी लोग पश्चिमी देशों का संरक्षण प्राप्त कर रहे थे।
मुस्लिम समुदाय का वह सारा हिस्सा चाहे फिलीस्तीन हो इराक हो लीबीया हो जब बेरोजगार हो गया और सामाजिक तथा आर्थिक रूप से मुख्य धारा में जब अपने ही देश में वह नहीं आ पाया तो हथियार उठना लाजिमी था।
अन्त में इतना ही कहना है कि जो बुद्धिजीवी मुस्लिम हैं उनकी यह जिम्मेदारी बनती है कि अगर कोई मुस्लिम हिंसा को इस्लाम के नाम पर वैध करार दे रहा है तो उसकी बहुत कठोरपूर्ण निन्दा होनी चाहिए।

बँट मत जाओ


जिस तरह से हमारे देश में जेएनयू से लेकर लुटियन्स दिल्ली, जादवपुर यूनिवर्सिटी, लखनऊ यूनिवर्सिटी, जम्मू-कश्मीर आदि हिस्सों मे वैचारिकता और भावनात्मकता की आग लगी हुई है इसमें अपने आप को शामिल करते हुए दूसरों को और अपने को बिना जले कैसे निकाला जाय, समझ नहीं आ रहा। एक नागरिक के तौर पर सरकार ( सरकार से मतलब भाजपा नही) के साथ जाना चाहूँगा और एक विचारशील व्यक्ति के तौर पर मैं रवीश कुमार, सिद्धार्थ वरदराजन, अरून्धती राय, प्रो आनन्द कुमार और उन सारे लोगों के साथ खड़ा होना चाहूँगा जो जेएनयू की विरासत पर गर्व करते हैं और सामाजिक सुरक्षा के मामलों में वामपंथी विचाधारा का समर्थन करते हैं।

सरकार के साथ इसलिए जाना चाहूँगा कि अगर मै सरकार की जिम्मेदारी लिए होता तो किसी समूह की वैचारिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने की बजाय उस समूह की सुरक्षा को तवज्जो देता। मैं सुरक्षा शब्द जोर देना चाहूँगा क्योंकि सरकार की इस मामले पर इसलिए आलोचना हो रही है क्योंकि सुरक्षा एजेंन्सियों की तत्परता और फुर्ती जो अभी तक परदे के पीछे या अपरोक्ष हुआ करती थी वह जेएनयू वाले मामले में पटल पर आ गयी। नागरिको की सुरक्षा सुनिश्चित करने के चक्कर में सरकार फँस गयी। इसमें हमें सुरक्षा एजेन्सियों के उन उपलब्ध संसाधनों पर ध्यान देने की जरूरत है जो कि हमारी सुरक्षा करने के लिहाज से बहुत ही सीमित हैं। इसीलिए कहीं कुछ बहुत बड़ी गड़बड़ ना हो जाय , इस बदहवासी में सुरक्षा एजेंन्सियों ने अतिसक्रियता दिखा दी। और उस बदहवासी की सबसे बड़ी वजह उन नारों की भाषा थी। जिसमें देश के टुकड़े करने की बात कही गयी।

विचारशील व्यक्ति के तौर पर मैं जेएनयू वालों और उन सभी पत्रकारों, प्राफेसरों और अपने विद्यार्थी दोस्तों के साथ हूँ क्योंकि मैं यह मानता हूँ अगर मेरे देश में (जो वर्तमान में देश की प्रचलित परिभाषा है) इसकी सीमा के भीतर माओवाद नक्सलवाद या किसी भी विचारधारा का आधार लेकर कुछ लोग अगर हिंसा करने पर उतारू हो गये तो यह मेरी , सरकार की नाकामी और नाकारापन है कि हम ’पब’ और ’बार’ और मंगल तक बढ़ गये और हमारे उन देशवासियों ( जिन्हे आज हम नक्सली कहते हैं ) के  क्षेत्रांे केे प्राकृतिक संसाधनों से होने वाली मोटी कमाई से जिन्होंने  ब्रिटेन में घर बना लिया और लास वेगास और पेरिस में बैठकर आज दारू पीते हैं उनके हाथों मे हम (सरकार और अनभिज्ञ जनता) तब भी नाच रहे थे और आज भी नाच रहें हैं। जहाँ तक रही माओ और माक्र्स की बात तो ये सारे लोंगो एक समाज की बेहतर परिकल्पना के परिप्रक्ष्य में हजार ऐसी बातें बताई है जिन्हें अपना लिया जाता तो शायद आज किसी को कोई दर्द ही नहीं होता। (लेकिन मेरा यह सोचना ठीक वैसा ही है जैसा कि प्लेटो ने समाज की कल्पना में कहा कि सारी औरतें सबकी बीबी हों और सभी बच्चे सबके बच्चे हों।) लेकिन माओ और माक्र्स की हिंसा और क्रान्तिकारी विचारधारा वाले हिस्से को पकड़कर पूरे माक्र्सवाद और माओवाद की लोकतंत्र की वेदी पर बलि दे दी जाती है। जैसे लगता है माओ कोई डाकू था। अगर इतनी ही समस्यायें हैं माक्र्स और माओ से है तो सारी सरकारें क्यों नहीं माक्र्स और माओ की किताबों पर बैन लगा देती। लोग क्यों यह भूल जाते हैं कि जिस लोकतंत्रात्मक गणराज्य को आज हम इतना पूजते है , उसकी बुनियाद में कई सारी महत्वपूर्ण ईटों माक्र्सवाद की लगी हैं। जिसकी प्रशंसा में इग्लैंण्ड , अमेरिका और हम अघाये रहते हैं।

इस सब के बाद भी हमें सुरक्षा एजेंसियों की व्यवहारगत और संसाधनगत मजबूरी को समझना होगा क्योंकि जिस तरह आतंकवाद दुनिया की नाक में दम करके बैठा और आतंकियों के मंसूबे पता चलते ही रूह थर्रा जाती है वहां पर हमें पहले अपनी सुरक्षा को तरजीह देनी होगी दूसरे पायदान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को रखना पड़ेगा।

मेरा अनुत्तरित निर्दोष प्रश्न -

मेरा अनुत्तरित निर्दोष प्रश्न -

कक्षा 7 या 8 में था तब से ही सामाजिक विज्ञान में हमार एक विषय था - नागरिक शास्त्र । उसमें हमारे एक टीचर थे परिहार सर। वो बार बार बताते थे कि हमारे देश में जनता का शासन है। तब ये बात समझ नहीं आती थी कि कैसे जनता का शासन है ? ये जनता शासन करती कहाँ है ? या कब जनता आती है और शासन करके चली जाती है। पता ही नहीं चलता था। मैं कई बार जब उनसे यही प्रश्न कर चुका था तो उन्होनें एक बार खीज कर बोला कि यार तुम पढने में बहुत अच्छे हो लेकिन ये बात तुम्हारे दिमाग में क्यों नहीं टिकती?
मैंने बोला सर ये जनता कब आती है शासन करने। जनता में तो मैं भी आता हूँ लेकिन मुझे कभी अहसास ही नहीं हुआ कि मैं कभी किसी पे शासन भी कर रहा हूँ। जब मेरे साथ के लड़के मेरे उपर हँसने लगे तो मैंने इस तथ्य को समझने के बजाय रट (याद कर) लिया। जिससे परीक्षा में गड़बड़ ना कर दूँ (लेकिन जब मैं अपने साथ वाले लड़कों से पूछता था कि भाई तुम्हें जनता शासन करती दिखती है क्या ? तो कन्फयूज तो वो भी होते थे लेकिन सुन के फिर हँस के टाल देते थे)। क्योंकि पिछले साल के पेपरों मे मैंने देखा था ये प्रश्न बहुत बार पूछा जाता था। आप्शन में तीन चार और देशों के नाम दे देता था पेपर बनाने वाला और मेरा दिमाग भन्ना जाता था। क्योंकि मुझे भारत का समझने में इतनी आफत थी तो मैं अमेरिका , इग्लैंण्ड, और आस्ट्रेलिया तो बहुत दूर की बात थी। तब भगवान नाम की एक सत्ता हुआ करती थी जिस पर बड़ा अडिग विश्वास था (जिससे मैंने दम लगाकर सिफारिश की थी कि हे भगवन् ये प्रश्न परीक्षा में ना आये)। लेकिन जैसे ही परीक्षा में दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र और पुराना लोकतंत्र करके दो प्रश्न आये और यही चार आप्शन (विकल्प) थे - भारत, अमेरिका, इग्लैंण्ड, आस्ट्रेलिया। मेरा काम तमाम हो गया और उस सत्ता का मोह भी जाता रहा । ये तो जानता था कि लोकतंत्र में जनता शासन करती है। (रट लिया था तो याद था )। लेकिन ये बडा़ और सबसे पुराना लोकतंत्र देखकर मुझे चक्कर आ गया। उस सदमें ने मुझे इतना हिलाया कि दोबारा सामाजिक विज्ञान या आर्ट विषयों की तरफ मुँह करके भी नहीं देखा मैंने।

लेकिन कई सालों बाद इस डर से उबरने के लिए मैंने राजनीति शास्त्र से एम0 ए0 (पी0जी0) किया। लेकिन अभी तक मुझे समझ नहीं आया कि जनता शासन करने कब आती है ? अब तो मैं वोटर भी बन चुका हूँ।