Monday, October 17, 2016

’’उस कैफे में फिर आ जाना’’

’’उस कैफे में फिर आ जाना’’
गर मुझसे शिकायत करनी हो
उस कैफे में फिर आ जाना
जहां बैठ के तेरी बातों को
सुनता रहता था रोजाना।।
कितना अच्छा तब लगता था
तेरी आंखों में बस खो जाना
तेरे लबों की सुर्खी पे अक्सर
फिर कविता कोई बना जाना
उस कैफे में फिर आ जाना
गर मुझसे शिकायत करनी हो।।
उस कैफे में फिर आ जाना।।
मेरे प्रश्नों के उत्तर में
तेरे कन्धों का वो उचकाना
तेरी कोल्ड काॅफी के आर्डर पे
मेरा कुढ़कर के रह जाना
उस कैफे में फिर आ जाना।।
गर मुझसे.......
राजनीति की बातों पर
तेरा इंग्लिश में वो बतियाना
फिर मेरे रूमानी होने पर
अनभिज्ञ हो मुँह को बिचकाना
उस कैफे में फिर आ जाना।।
घंटो फयूचर प्लानिंग करना
मेरे दिल की हीलिंग करना
फिर मुझको नसीहत जीवन की
हलके-हलके से दे जाना
गालों पे लटके बालों को 
कानों पे फिर से चढ़ा जाना
उस कैफे में फिर आ जाना।।

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