मेरी हैसियत ना होने की वजह से
कोई मेरी सुनता ही नहीं है
अब देखिए आपने कविता सुनाने का मौक़ा दे दिया है तो ,
इसको मैं अपने बारे में सुनाने के लिए मिले मौक़े की तरह इस्तेमाल करूँगा
मैं कविता ही सुनाऊँगा
घबराइए मत
तो मुझे कहना है कि मैं स्व-पंथी हूँ
नहीं समझे ?
विस्तार से बताता हूँ …….
झेलने के लिए तैयार रहिए
क्या है कि मेरे जो सहकर्मी है
मुझे दक्षिणपंथी कहते हैं
और मेरे जो घरवाले हैं वो वामपंथी बुलाते हैं
अब यों है कि मुझे दोनों पंथों की समझ
बहुत घनघोर है , बिल्कुल अधिकारपूर्ण
इन सबके पाखंडों को मैं भली-भाँति समझता हूँ
अपने पाखंड को भी , पाखंडी मैं भी हूँ
बस मैं इनसे इस मामले में अलग हूँ
कि मुझे मेरे पाखंड का अहसास है
लेकिन इन दुमछल्लों को इसका रत्ती भर भान नहीं है
अब मेरी गाड़ी अटक गयी है
नहीं इसलिए नहीं कि
मैं तय नहीं कर पा रहा हूँ किधर जाना सही रहेगा ?
मैं स्व-पंथी हूँ बताया तो मैंने
अब मेरा कोई कुनबा नहीं है
लेकिन वामपंथियों का और दक्षिणपंथियों का कुनबा है
कुनबा होने से क्या है कि दूसरे पंथ वालों को गरियाने की सहूलियत रहती है
और सुरक्षा का भाव बना रहता है
लेकिन मेरी गाड़ी इसलिए नहीं अटकी कि मेरा कुनबा नहीं है
बल्कि इसलिए अटकी है कि ये जो पंथिये हैं मुझे लेकर आजतक आशावान हैं कि मैं उनके कुनबे में शामिल हो जाऊँ
वह खुद के ऊपर मेरा अविश्वास जमने ही नहीं दे रहे हैं …
कि मैं ये मान लूँ कि इस खेमें ने मेरा साथ छोड़ दिया ……
मैं बस इसी फ़िराक़ में हूँ कि ……
कब मेरा इनसे विश्वास उठे
और कब मैं आश्वस्त होऊँ कि फ़लाँ फ़लाँ सहकर्मी मेरा साथ नहीं देगा
इसी कश्मकश के बीच विचारधाराओं की इस रपटीली पगडंडी पर मैंने और उन्होंने मनुष्यता को बचा रखा है …….
सहकारिता के उस भाव को बचाया हुआ है जिससे अंत में मेरे , उनके और हम सबके मूलभूत लक्ष्य मानवता की रक्षा के लक्ष्य का सपना साकार होगा ॥
अब मैं कैसे इन्हें समझाऊँ कि जीवन के अंतिम लक्ष्य को प्राप्त करने का रस्ता
कुनबे और वैचारिक पक्षधरता का मोहताज नहीं है ………..