पिता से शिकायती स्वर रहा
हर बातचीत में
जीवन में लगने वाली हर कमी के
सदैव जिम्मेदार दिखे पिता
वह अपने जीवन और अनुभव का संघर्ष
परोसते रहे अनवरत
मेरे ध्यान से ना सुने जाने के बावजूद
पर सब कुछ था मेरे काम का
जो नहीं सुना गया
उन्होंने चुपचाप ली जिम्मेदारी
मेरे जीवन के हर अधूरेपन की
वह बहुत बातूनी थे
पर इस मसले पर शायद कभी उन्होंने बोला हो
मैं अपने संघर्षों को उनके संघर्षों से तौलता रहा
और सदैव ऊपर रखता रहा अपने संघर्षों को
मेरी उम्र जैसे-जैसे बढ़ती गई
उनके संघर्षों की विराटता बढ़ती गई
उनकी एक ईमानदार और सच्ची सलाह मात्र से
लोग चढ़ते रहे दुनियावी सफलता की सीढ़ियाँ
पिता के हिस्से आया सिर्फ़ संघर्ष
वह नहीं सिखा पाये किसी को
किसी प्रतिद्वंदी की सफलता में खुश होना
साथ वो सबके थे जैसे एक मनुष्य को होना चाहिए
बस यही वजह थी उनके संघर्षों के विराटता की
उन्होंने अपने साथ-साथ सबके लिए किया
मैंने बस अपने लिए किया संघर्ष
मेरा दौर आते आते मनुष्यता की सामान्य समझ सिमट कर यही रह गई थी शायद ,
और मैं पिता नहीं था ।।
@ शुभांकर