Thursday, October 20, 2016

जब बापू मेरा पगलाता है।

जब बापू मेरा पगलाता है।

घर में भाई बहनों के संग मेरी भी बैंड बजाता है।
जब हम कुछ नया अगर सोंचे
तो हमको नादान बताता है
हर नये काम में अक्सर वह
बुनियादी कमी बताता है
जब बापू मेरा पगलाता है।

बाइक और कार की चाबी वह
लगी छोड़ कर आता है
फिर अगली सुबह ना मिलने पर
मेरे उपर चिल्लाता है।
जब बापू मेरा पगलाता है।

उसकी मर्जी के अलग कहीं
गर खाने में कुछ बन जाता है
मेरी माँ के मुँह पर तब वह
थाली को राॅकेट बनाता है।
जब बापू मेरा  पगलाता है।।

सारे बेहूदा कामों को वो
मेरे जिम्मे कर जाता है
उसके चक्कर मेें मेरा सब
टाइम खराब हो जाता है।
जब बापू मेरा पगलाता है।।
काम खत्म हो जाने पर
जब दफतर से घर वो आता है
दूजों से पैसे माँग के वह
एक दारू की बोतल लाता है
खाने से पहले उसमें से दो
पटियाला पैग बनाता है
जब बापू मेरा पगलाता है।।

फिर मेरी माँ के उपर वह
पूरे दम से चिल्लाता है
जब बापू मेरा पगलाता है।।

सपने तू चला जा

सपने तू चला जा अब मैं तेरा पीछा नहीं करूंगा

घर पे माँ अकेली है मेरी
अब उसके साथ रहूँगा
उसकी गोदी में सर रखकर
अब जोर-जोर रोउँगां
सपने तू चला जा अब मैं तेरा पीछा नहीं करूँगां।।

पापा के आॅफिस में जाकर
अब उनसे गले मिलूँगा
अपनी सारी नादानी की
उनसे माफी मागूंगा
सपने तू चला जा अब मैं तेरा पीछा नहीं करूंगा
तेरा पीछा करते-करते
मेरे कितने अपने छूटे
चुन चुन के उन रिश्तों के
अब मैं सारे कर्ज भरूंगा
सपने तू चला जा अब मैं तेरा पीछा नहीं करूंगा।।

झूठे सारे किस्से हैं
पर ढ़ब से बनाये गये हैं
बुनियाद खोखली हो जिसकी
मैं वो किस्सा नहीं बनूंगा
सपने तू चला जा अब मैं तेरा पीछा नहीं करूंगा
घर में माँ अकेली है मेरी
मैं उसके साथ रहूंगा।।

जो भी तुझसे शिकवे थे
अब सब वापस ले लूंगा
उनको इक कलश में रखकर
गंगा में विसर्जित करूंगा ।।
सपने तू चला जा अब मैं तेरा पीछा नहीं करूंगा

तुझको पाने को अब तक
कितनी रातें जागी हैं
अब पीछा छोड़ के तेरा
मैं चैन की नींद सोउंगा
तू नहीं मिला तो क्या है ?
फिर भी बिंदास जिऊंगा
सपने तू चला जा अब मैं तेरा पीछा नहीं करूंगा।।

माँ’


दुनिया मेरे पीछे पड़ी
पर संग मेरे थी माँ खड़ी
सर पे मेरे रख हाथ वो
कितनी ही रातों को जगी

जो भी मेरे से जब भिड़ा
माँ मेरी उससे लड़ पड़ी
मैं जो गलत भी करता था
उसके लिए था सब सही

एक दिन मुझे पुचकारकर
बोली वो चल नन्हें बड्डी
गिरने से तू डरना नहीं
पीछे हूँ मैं तेरे खड़ी
उसकी इजाजत के बिना
जो कुछ हुआ ना हुआ सही
मैं सोचता हूँ आज भी
माँ थी मेरी कितनी बड़ी

किस्मत मेरी तू ये बता
मेरी माँ छुपा के कहाँ रखी
क्या तुझे भी माँ कमी खली

महसूस मैं करता हूँ जैसे
माँ मेरी है यहीं कहीं
माँ मेरी सबसे बड़ी ।।



वो हुक्का पीकर आती थी

देहरादून की घाटी थी
अपने काॅलेज में ज्यादातर
वो लेट लतीफ ही आती थी
एक दिन मैंने देखा उसको
वो हुक्का पीकर आती थी

पीछा करने वाले को वह
पूरा कैम्पस घुमवाती थी
पर फिर भी हाथ ना आती थी।
इसी बीच में कभी-कभी वह ’हर्ले’ पे बैठ के आती थी।
रेसिंग करने वालों की फिर घिघ्घी सी बँध जाती थी
वह हुक्का...........


घण्टाघर के मार्केट में
वह शार्ट्स पहन के आती थी
गोरी चिट्टी  चमड़ी उसकी
लोगों का दिल सुलगाती थी
देहरादून की घाटी थी
वह हुक्का पीकर आती थी।।


जब रात वहाँ हो जाती थी
हाॅस्टल के छत पर वो जाती थी।
दो बोतल बीयर गटका के
खाली बोतल लुढ़काती थी
वह हुक्का पीकर आती थी
देहरादून की घाटी थी।।

Wednesday, October 19, 2016

खुद्दारी

अपने पैरों पे होके खड़ा जब तक ना सब को दिखायेगा बिन पात्र दिखे सबके सम्मुख तू ऐसे ठोकर खायेगा ।। अपने पैरों.........
अब मदद मांगना छोड़ के तू खुद में ऐसा परिवर्तन कर कि जाने तुझको लोग सभी वरना ऐसे पछतायेगा ।। अपने पैरों..........

सब उगते सूरज से हरदम रोशनी चुराते रहते हैं अपने अन्दर कुछ जला दे वो जिससे सूरज ढ़क जायेगा ।। अपने पैरों पे होके खड़ा जब तक ना सबका दिखायेगा।।

सब वक्त के साथ बदलते हैं तू किसको अपना बतायेगा गर चिन्ता इसकी छोड़ दे तू तो पक्का कुछ कर जायेगा ।। अपने पैरों.......... जब तक ना सबको दिखायेगा।।

मेरा प्यारा यार चुप

एक चुप हजार चुप
वह था बार-बार चुप
हर तरह की हलचलों पे
मेरा प्यारा यार चुप
एक चुप...........


आत्मा से जल रहा था
दर्द से पिघल रहा था
मौत पास आ गयी
पता उसे ये चल रहा था
साथ में खड़ा अधेरा
उसको लीलता था घुप
एक चुप हजार चुप
वह था बार-बार चुप


लक्ष्य के मुहाने पर
पहुँच चुका था वो तुरूप
आत्मा ने बोला तब
फायदा नहीं है अब कुछ
एक चुप......
वह था बार-बार चुप ।।

Tuesday, October 18, 2016

हर इक पल कुछ ढ़ल जाता हूँ

क्यों मैं ये समझ ना पाता हूँ
हर इक पल कुछ ढ़ल जाता हूँ
मानवता के अंगारों पर चलने पहले आ जाता हूँ
हर इक पल कुछ ढ़ल जाता हूँ


तेरे मेरे के नारों में
मैं सबक नारा लगाता हूँ
सच्चे झूठों की बहसों में क्यों
झूठा कहलाया जाता हूँ ।।
हर इक पल.......


जो साथ चले आये अब तक
अब भी उनको उकसाता हूँ
मत करना आत्मसमर्पण तुम
मैं पक्की बात बताता हूँ।।
हर इक पल मैं कुछ.........

चिनारों का शहर होगा

चिनारों का शहर होगा
उस बीच कहीं पर छोटा सा
नारंगी अपना घर होगा
रात और दिन से बेफिक्र वहीं
बहारों से लिपटा हर पहर होगा
चिनारों का शहर होगा।।


वहीं पास में बहता इक दरिया
हम जिसके किनारे बैठेंगे
तेरे गोद में हाथों के नीचे
पड़ा हुआ मेरा सर होगा।
चिनारों का शहर होगा।।


तेरी गोद मैं लेटे-लेटे जब
तेरे गालों पे उंगली फिराउँगा
यह सोच सिहर मैं जाता हूँ
क्या रूमानी मंजर होगा ।
चिनारों का शहर होगा ।।


मैं इत्रफरोश सा बैठूंगा
तेरे ऐहतराम की चाहत में
जब आयेगी तू फिर तो बस
तुझ से माहौल वो तर होगा ।
चिनारों का शहर होगा।।

गर मैं राजा बनूँगा कभी तो

गर मैं राजा बनूँगा कभी तो
नाम तेरा निसाबों में होगा
अपने बारे में चर्चा शहर के
सारे चर्चित खराबों में होगा ।।
गर मैं राजा.....

शब जो आये तो आने दो उसको
शामियाना तो आबाद होगा
गर अंधेरे ने जुर्रत करी तो
उसका लहू फिर चिरागों में होगा।।
गर मैं राजा......

लांघ जायेगें हम सारी हद को
खूबसूरत वो अगाज होगा
जो पहँुचना जहाँ चाहेगा फिर
पैरवी का ना मोहताज होगा।।
गर मैं राजा.....

फूलों से सब दुकाने भरेंगी
खुशबुओं का ही बाजार होगा
सब हाथ में हाथ डाले चलेंगें
न कत्ल का कोई औजार होगा।।
गर मैं राजा..........

Monday, October 17, 2016

’’उस कैफे में फिर आ जाना’’

’’उस कैफे में फिर आ जाना’’
गर मुझसे शिकायत करनी हो
उस कैफे में फिर आ जाना
जहां बैठ के तेरी बातों को
सुनता रहता था रोजाना।।
कितना अच्छा तब लगता था
तेरी आंखों में बस खो जाना
तेरे लबों की सुर्खी पे अक्सर
फिर कविता कोई बना जाना
उस कैफे में फिर आ जाना
गर मुझसे शिकायत करनी हो।।
उस कैफे में फिर आ जाना।।
मेरे प्रश्नों के उत्तर में
तेरे कन्धों का वो उचकाना
तेरी कोल्ड काॅफी के आर्डर पे
मेरा कुढ़कर के रह जाना
उस कैफे में फिर आ जाना।।
गर मुझसे.......
राजनीति की बातों पर
तेरा इंग्लिश में वो बतियाना
फिर मेरे रूमानी होने पर
अनभिज्ञ हो मुँह को बिचकाना
उस कैफे में फिर आ जाना।।
घंटो फयूचर प्लानिंग करना
मेरे दिल की हीलिंग करना
फिर मुझको नसीहत जीवन की
हलके-हलके से दे जाना
गालों पे लटके बालों को 
कानों पे फिर से चढ़ा जाना
उस कैफे में फिर आ जाना।।