देहरादून की घाटी थी
अपने काॅलेज में ज्यादातर
वो लेट लतीफ ही आती थी
एक दिन मैंने देखा उसको
वो हुक्का पीकर आती थी
पीछा करने वाले को वह
पूरा कैम्पस घुमवाती थी
पर फिर भी हाथ ना आती थी।
इसी बीच में कभी-कभी वह ’हर्ले’ पे बैठ के आती थी।
रेसिंग करने वालों की फिर घिघ्घी सी बँध जाती थी
वह हुक्का...........
घण्टाघर के मार्केट में
वह शार्ट्स पहन के आती थी
गोरी चिट्टी चमड़ी उसकी
लोगों का दिल सुलगाती थी
देहरादून की घाटी थी
वह हुक्का पीकर आती थी।।
जब रात वहाँ हो जाती थी
हाॅस्टल के छत पर वो जाती थी।
दो बोतल बीयर गटका के
खाली बोतल लुढ़काती थी
वह हुक्का पीकर आती थी
देहरादून की घाटी थी।।
अपने काॅलेज में ज्यादातर
वो लेट लतीफ ही आती थी
एक दिन मैंने देखा उसको
वो हुक्का पीकर आती थी
पीछा करने वाले को वह
पूरा कैम्पस घुमवाती थी
पर फिर भी हाथ ना आती थी।
इसी बीच में कभी-कभी वह ’हर्ले’ पे बैठ के आती थी।
रेसिंग करने वालों की फिर घिघ्घी सी बँध जाती थी
वह हुक्का...........
घण्टाघर के मार्केट में
वह शार्ट्स पहन के आती थी
गोरी चिट्टी चमड़ी उसकी
लोगों का दिल सुलगाती थी
देहरादून की घाटी थी
वह हुक्का पीकर आती थी।।
जब रात वहाँ हो जाती थी
हाॅस्टल के छत पर वो जाती थी।
दो बोतल बीयर गटका के
खाली बोतल लुढ़काती थी
वह हुक्का पीकर आती थी
देहरादून की घाटी थी।।
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