Sunday, March 13, 2016

मुझे शब्द दे दो मैं कहीं भी रह लूँगा

मुझे शब्द दे दो मैं कहीं भी रह लूँगा।
गिरि , खोह , वन प्रान्तर
कहीं भी ,
क्योंकि शब्दों के लिए मनुष्य जरूरी नहीं होते,
पेड़ पौधे पशु-पक्षाी -
वे भी समझते हैं कि हम उनकों कितना समझा पाते हैं,
इसिलिए मैं सारे कष्ट सह लूंगा , पर -
मुझे शब्द दे दो मैं कहीं भी रह लूंगा।।
जब से मानवों ने पेड़ों के जंगल काटने प्रारम्भ किये और
कंक्रीट के जंगल बनाये,
स्वार्थ हित पशुवध किया-
तब से इन्होंने बोलना बन्द कर दिया है-
मुझे इनके बीच कर दो मैं बात कर लूंगा,
पर मुझे शब्द दे दो मैं कहीं भी रह लूंगा।।
चाहूँ तो शब्दों से अकूत सम्पत्ति बटोर लूं,
इम्पोर्टेड गाडि़यों में चलूं,
पर यह शब्दों के साथ बलात्कार होगा,
और शब्द मेरे लिए अखण्ड, अनन्त और निष्प्रपंच हैं ,
मुझे वह बल दो प्रभु जिससे अपनी सत्ता को शब्द की सत्ता के साथा एकाकार कर सकूँ।
शब्द में विलीन हो जाऊँ
तभी मेरी मुक्ति है,
ले लो मैं सब कुछ दे दूगाँ, पर-
मुझे शब्द दे दो , मैं कहीं भी रह लूंगा।।


                                    लेखक- आशुतोष शुक्ल ’स्थाणु’

Saturday, March 12, 2016

मौका भी है दस्तूर भी , जवानी भी है फितूर भी।।


हमारे वामपंथी भाइयों की यह दलील कि वे दमित, शोषित, पिछड़े, कुचले लोंगों की बात करते हैं , अब धीरे-धीरे सन्देह पैदा करने लगी है। क्योंकि जितना मैंने वामपंथ को पढ़ा उससे यह समझ में आया कि वामपंथियों के लिए उनके समाजवादी राज्य का निर्माण करने वाले सपने के लिए अनुकूल परिस्थितियां भारत में थाल सजाकर बैठी हैं लेकिन यह लोग किस धारा में विचारमग्न हैं यह समझ नही आता।
नवम्बर 1917 में रूसी क्रन्ति के समय जारशाही का अन्त करने के लिए जब बोल्शेविक और मेन्शेविक दो साम्यवादी दल अपनी अलग-अलग राय के चलते अलग हो गये तो उसके पीछे की वजह यही थी कि बोल्शेविक जिसका नेता लेनिन था उसने कहा कि ’जारशाही’ के तख्ता पलट करने के सिवाय किसी और तरह से हमें उससे मुक्ति नहीं मिल सकती उसने कहा कि मजदूरों और किसानों को मिलाकर सैनिकों का एक ऐसा दस्ता तैयार करो जो अन्य लोंगो को क्रान्ति के लिए प्रेरित करे। लेनिन का मानना था कि - ’’ क्रान्ति होती नहीं क्रान्ति की जाती है।’’ लेकिन ठीक इसके विपरीत मेन्सेविकों का मानना था कि अभी हमारे (रूस के) किसान क्रान्ति के लिए तैयार नहीं है। मेन्सेविकों का मानना था समाजवाद का विकास क्रमिक रूप से बिना हिंसा के हो तो ज्यादा अच्छा है। लेकिन लेनिन कहता था कि क्रमिक रूप से विकास करने के चक्कर में ’हम अपने लोगों को पूँजीवादी व्यवस्था के कष्टों से क्यों गुजारें।’ इसलिए क्रान्ति कर दो।
अब आते हैं भारत के सन्दर्भ में । आज के मौजूदा परिदृश्य में समाजवादी (साम्यवादी) राज्य की स्थापना के लिए 1917 के रूस की तुुलना में ज्यादा मुफीद पस्थितियां है। जैसे कि आज हमारे किसान रोज आत्महत्या कर रहें हैं। हिन्दुस्तान डेली के मुताबिक जितनी मौते हमारे जवानों की आतंकवाद और कश्मीर पर सीमा सुरक्षित करने में नहीं हुई उससे ज्यादा जवान नक्सलियों के हाथों मार दिये गये। ये रिकार्ड 2015 में है। 1998 से लेकर 2015 तक लगभग पूरे देश में 12 या 1400000 लाख किसानों ने अपनी आत्महत्या कर ली। अर्थात् कहने का अर्थ यह है कि जो बुनियादी आधार एक वामपंथी राज्य बनाने तथा क्रान्ति के लिए चाहिए वो सब मौजूद है।
अभी सरकार ने जो लेबर कानून पास करने की बात कही है (शायद पास हो गया क्या) उसमें भी मजदूरों को यूनियन बनाने के अधिकार छीनने की बात की जा रही थी जिससे मैं भी सहमत नहीं हूँ। और भी कई क्लाॅज है उस कानून में जो मजदूरों के हित में नहीं है।
अर्थात् मेरी अपने वामपंथी साथियों से अपील है कि फल लटक रहें हैं जल्दी तोडो। फसल पक चुकी है। आप केवल जेएनयू में बैठकर बौद्धिक प्रलाप करेंगें इधर इतनी अच्छी मुफीद परिस्थितियां और क्रान्ति करने के सारे आधार नष्ट हो रहें हैं। सारे किसानों , मजदूरों और नक्सलियों को इकठ्ठा करो और टूट पड़ो मैदान में। लेनिन की तरह । गजब का बन्दा था। उसके बारे में चेम्बेरलेन ने कहा था कि- ’’नेपोलियन के बाद इतिहास का रूख मोड़ने वाला लेनिन जैसा दूसरा कोई नहीं पैदा हुआ।’’
( वैधानिक चेतावनी- कृपया इससे कोई आहत ना हो। और नक्सलियों और किसानो की समस्यायों को लेकर मैं उचित रूप से गंभीर हूँ )

बस परिप्रेक्ष्य का फेर है।

दुनिया में लगभग एक चैथाई हिस्से पर मुस्लिम आबादी निवास करती है। और जिस तरह से आतंकवाद को मुस्लिम समुदाय से जोड़ने का एक फैशन सा चल पड़ा है उसके पीछे की सबसे बड़ी वजह यह है कि कुछ यूरोपीय देश और अमेरिका इन दोनो ने परिप्रेक्षिक मोतियाबिन्द के हालात पैदा कर दिये है। मतलब अगर अमेरिका में कुछ गोरे लोगों की कोई काला अमेरिकी हत्या कर दे तो यह व्यक्तिगत उन्माद या उस व्यक्ति का पागलपन माना जाता है। अगर कोई गोरा आस्ट्रेलिया या अमेरिका में किसी पंजाबी या भारतीयों के गुरूद्वारे के सामने गोली चला दे यह उसकी व्यक्तिगत समस्या है। वही अगर कोई मुस्लिम यही काम कर दे तो इसे ’आतंकवाद’ कहा जाता है। क्या शिवसेना के इशारे पर उत्तर भारतीयों को मारना आतंकवाद के दायरे में नहीं लाया जा सकता ? दरअसल आतंकवाद की इस धुँधली और पारिभाषिक विदू्रपता का सहारा लेकर मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाया जा रहा इस तथ्य को नकारते हुए कि दुनिया में कितने मुस्लिम डाक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक और पता नहीं क्या-2 होंगे जिसे लोग अपनी नजर में अच्छे कामों मे गिनती करते हैं। इस बात पर बहस छिड़ते ही लोग मध्य एशिया में चल रहे उथल-पुथल को मुस्लिम और इस्लामिक कट्टरवाद की संज्ञा दे देते है। लेकिन यह एक घोर राजनीतिक समस्या है। यह ’सामरिक अर्थशास्त्र’ है जिसे अमेरिका और उसके मित्र देशों ने बड़े करीने से भुनाया है। । लोगों का ध्यान फ़्रांस में मारे गये चंद लोगो पर बड़ी आसानी से चला जाता है लेकिन फिलीस्तीन में मुस्लिमों को रोज मारा जा रहा है उस पर लोंगो का ध्यान नहीं जाता। ध्यान जाता है लेकिन अगर उसकी तरफदारी करेंगें तो सारे विकसित राष्ट्रों की दुश्मनी मोल लेनी पड़ेगी। दुनिया में कौन सा ऐसा देश है जो अपनी जमीन पर जबरदस्ती किसी दूसरी जाति (यहूदी) और देश का अधिग्रहण बर्दास्त करेगा, जैसा कि फिलीस्तीन भी नहीं कर पा रहा है। इससे बड़ा राजनीतिक शोषण इतिहास में नहीं मिलेगा।
अगर लोग यह कहते हैं कि जहाँ मुस्लिम है वहाँ समस्या है तो लोग इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे देशों के बारे में बात क्यों नहीं करते ? ये दोंनो ही समृद्ध देशों की श्रेणी में दिखते हैं। और शिया सुन्नी की बात की जाती है तो इस विवाद को भी इसलिए हवा मिली क्योंकि पश्चिमी देशों ने अपने हित को देखते हुए उसी मुस्लिम समुदाय के एक भाई का साथ दिया और दूसरे भाई के घर का जब चूल्हा नहीं जला और बेरोजगारी झेलनी पड़ी तो अपने भाई के संरक्षक से ज्यादा गुस्सा अपने भाई पर आया क्योंकि यह सब शिया के साथ के हो रहा था सुन्नी लोग पश्चिमी देशों का संरक्षण प्राप्त कर रहे थे।
मुस्लिम समुदाय का वह सारा हिस्सा चाहे फिलीस्तीन हो इराक हो लीबीया हो जब बेरोजगार हो गया और सामाजिक तथा आर्थिक रूप से मुख्य धारा में जब अपने ही देश में वह नहीं आ पाया तो हथियार उठना लाजिमी था।
अन्त में इतना ही कहना है कि जो बुद्धिजीवी मुस्लिम हैं उनकी यह जिम्मेदारी बनती है कि अगर कोई मुस्लिम हिंसा को इस्लाम के नाम पर वैध करार दे रहा है तो उसकी बहुत कठोरपूर्ण निन्दा होनी चाहिए।

बँट मत जाओ


जिस तरह से हमारे देश में जेएनयू से लेकर लुटियन्स दिल्ली, जादवपुर यूनिवर्सिटी, लखनऊ यूनिवर्सिटी, जम्मू-कश्मीर आदि हिस्सों मे वैचारिकता और भावनात्मकता की आग लगी हुई है इसमें अपने आप को शामिल करते हुए दूसरों को और अपने को बिना जले कैसे निकाला जाय, समझ नहीं आ रहा। एक नागरिक के तौर पर सरकार ( सरकार से मतलब भाजपा नही) के साथ जाना चाहूँगा और एक विचारशील व्यक्ति के तौर पर मैं रवीश कुमार, सिद्धार्थ वरदराजन, अरून्धती राय, प्रो आनन्द कुमार और उन सारे लोगों के साथ खड़ा होना चाहूँगा जो जेएनयू की विरासत पर गर्व करते हैं और सामाजिक सुरक्षा के मामलों में वामपंथी विचाधारा का समर्थन करते हैं।

सरकार के साथ इसलिए जाना चाहूँगा कि अगर मै सरकार की जिम्मेदारी लिए होता तो किसी समूह की वैचारिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने की बजाय उस समूह की सुरक्षा को तवज्जो देता। मैं सुरक्षा शब्द जोर देना चाहूँगा क्योंकि सरकार की इस मामले पर इसलिए आलोचना हो रही है क्योंकि सुरक्षा एजेंन्सियों की तत्परता और फुर्ती जो अभी तक परदे के पीछे या अपरोक्ष हुआ करती थी वह जेएनयू वाले मामले में पटल पर आ गयी। नागरिको की सुरक्षा सुनिश्चित करने के चक्कर में सरकार फँस गयी। इसमें हमें सुरक्षा एजेन्सियों के उन उपलब्ध संसाधनों पर ध्यान देने की जरूरत है जो कि हमारी सुरक्षा करने के लिहाज से बहुत ही सीमित हैं। इसीलिए कहीं कुछ बहुत बड़ी गड़बड़ ना हो जाय , इस बदहवासी में सुरक्षा एजेंन्सियों ने अतिसक्रियता दिखा दी। और उस बदहवासी की सबसे बड़ी वजह उन नारों की भाषा थी। जिसमें देश के टुकड़े करने की बात कही गयी।

विचारशील व्यक्ति के तौर पर मैं जेएनयू वालों और उन सभी पत्रकारों, प्राफेसरों और अपने विद्यार्थी दोस्तों के साथ हूँ क्योंकि मैं यह मानता हूँ अगर मेरे देश में (जो वर्तमान में देश की प्रचलित परिभाषा है) इसकी सीमा के भीतर माओवाद नक्सलवाद या किसी भी विचारधारा का आधार लेकर कुछ लोग अगर हिंसा करने पर उतारू हो गये तो यह मेरी , सरकार की नाकामी और नाकारापन है कि हम ’पब’ और ’बार’ और मंगल तक बढ़ गये और हमारे उन देशवासियों ( जिन्हे आज हम नक्सली कहते हैं ) के  क्षेत्रांे केे प्राकृतिक संसाधनों से होने वाली मोटी कमाई से जिन्होंने  ब्रिटेन में घर बना लिया और लास वेगास और पेरिस में बैठकर आज दारू पीते हैं उनके हाथों मे हम (सरकार और अनभिज्ञ जनता) तब भी नाच रहे थे और आज भी नाच रहें हैं। जहाँ तक रही माओ और माक्र्स की बात तो ये सारे लोंगो एक समाज की बेहतर परिकल्पना के परिप्रक्ष्य में हजार ऐसी बातें बताई है जिन्हें अपना लिया जाता तो शायद आज किसी को कोई दर्द ही नहीं होता। (लेकिन मेरा यह सोचना ठीक वैसा ही है जैसा कि प्लेटो ने समाज की कल्पना में कहा कि सारी औरतें सबकी बीबी हों और सभी बच्चे सबके बच्चे हों।) लेकिन माओ और माक्र्स की हिंसा और क्रान्तिकारी विचारधारा वाले हिस्से को पकड़कर पूरे माक्र्सवाद और माओवाद की लोकतंत्र की वेदी पर बलि दे दी जाती है। जैसे लगता है माओ कोई डाकू था। अगर इतनी ही समस्यायें हैं माक्र्स और माओ से है तो सारी सरकारें क्यों नहीं माक्र्स और माओ की किताबों पर बैन लगा देती। लोग क्यों यह भूल जाते हैं कि जिस लोकतंत्रात्मक गणराज्य को आज हम इतना पूजते है , उसकी बुनियाद में कई सारी महत्वपूर्ण ईटों माक्र्सवाद की लगी हैं। जिसकी प्रशंसा में इग्लैंण्ड , अमेरिका और हम अघाये रहते हैं।

इस सब के बाद भी हमें सुरक्षा एजेंसियों की व्यवहारगत और संसाधनगत मजबूरी को समझना होगा क्योंकि जिस तरह आतंकवाद दुनिया की नाक में दम करके बैठा और आतंकियों के मंसूबे पता चलते ही रूह थर्रा जाती है वहां पर हमें पहले अपनी सुरक्षा को तरजीह देनी होगी दूसरे पायदान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को रखना पड़ेगा।

मेरा अनुत्तरित निर्दोष प्रश्न -

मेरा अनुत्तरित निर्दोष प्रश्न -

कक्षा 7 या 8 में था तब से ही सामाजिक विज्ञान में हमार एक विषय था - नागरिक शास्त्र । उसमें हमारे एक टीचर थे परिहार सर। वो बार बार बताते थे कि हमारे देश में जनता का शासन है। तब ये बात समझ नहीं आती थी कि कैसे जनता का शासन है ? ये जनता शासन करती कहाँ है ? या कब जनता आती है और शासन करके चली जाती है। पता ही नहीं चलता था। मैं कई बार जब उनसे यही प्रश्न कर चुका था तो उन्होनें एक बार खीज कर बोला कि यार तुम पढने में बहुत अच्छे हो लेकिन ये बात तुम्हारे दिमाग में क्यों नहीं टिकती?
मैंने बोला सर ये जनता कब आती है शासन करने। जनता में तो मैं भी आता हूँ लेकिन मुझे कभी अहसास ही नहीं हुआ कि मैं कभी किसी पे शासन भी कर रहा हूँ। जब मेरे साथ के लड़के मेरे उपर हँसने लगे तो मैंने इस तथ्य को समझने के बजाय रट (याद कर) लिया। जिससे परीक्षा में गड़बड़ ना कर दूँ (लेकिन जब मैं अपने साथ वाले लड़कों से पूछता था कि भाई तुम्हें जनता शासन करती दिखती है क्या ? तो कन्फयूज तो वो भी होते थे लेकिन सुन के फिर हँस के टाल देते थे)। क्योंकि पिछले साल के पेपरों मे मैंने देखा था ये प्रश्न बहुत बार पूछा जाता था। आप्शन में तीन चार और देशों के नाम दे देता था पेपर बनाने वाला और मेरा दिमाग भन्ना जाता था। क्योंकि मुझे भारत का समझने में इतनी आफत थी तो मैं अमेरिका , इग्लैंण्ड, और आस्ट्रेलिया तो बहुत दूर की बात थी। तब भगवान नाम की एक सत्ता हुआ करती थी जिस पर बड़ा अडिग विश्वास था (जिससे मैंने दम लगाकर सिफारिश की थी कि हे भगवन् ये प्रश्न परीक्षा में ना आये)। लेकिन जैसे ही परीक्षा में दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र और पुराना लोकतंत्र करके दो प्रश्न आये और यही चार आप्शन (विकल्प) थे - भारत, अमेरिका, इग्लैंण्ड, आस्ट्रेलिया। मेरा काम तमाम हो गया और उस सत्ता का मोह भी जाता रहा । ये तो जानता था कि लोकतंत्र में जनता शासन करती है। (रट लिया था तो याद था )। लेकिन ये बडा़ और सबसे पुराना लोकतंत्र देखकर मुझे चक्कर आ गया। उस सदमें ने मुझे इतना हिलाया कि दोबारा सामाजिक विज्ञान या आर्ट विषयों की तरफ मुँह करके भी नहीं देखा मैंने।

लेकिन कई सालों बाद इस डर से उबरने के लिए मैंने राजनीति शास्त्र से एम0 ए0 (पी0जी0) किया। लेकिन अभी तक मुझे समझ नहीं आया कि जनता शासन करने कब आती है ? अब तो मैं वोटर भी बन चुका हूँ।