Saturday, March 12, 2016

मेरा अनुत्तरित निर्दोष प्रश्न -

मेरा अनुत्तरित निर्दोष प्रश्न -

कक्षा 7 या 8 में था तब से ही सामाजिक विज्ञान में हमार एक विषय था - नागरिक शास्त्र । उसमें हमारे एक टीचर थे परिहार सर। वो बार बार बताते थे कि हमारे देश में जनता का शासन है। तब ये बात समझ नहीं आती थी कि कैसे जनता का शासन है ? ये जनता शासन करती कहाँ है ? या कब जनता आती है और शासन करके चली जाती है। पता ही नहीं चलता था। मैं कई बार जब उनसे यही प्रश्न कर चुका था तो उन्होनें एक बार खीज कर बोला कि यार तुम पढने में बहुत अच्छे हो लेकिन ये बात तुम्हारे दिमाग में क्यों नहीं टिकती?
मैंने बोला सर ये जनता कब आती है शासन करने। जनता में तो मैं भी आता हूँ लेकिन मुझे कभी अहसास ही नहीं हुआ कि मैं कभी किसी पे शासन भी कर रहा हूँ। जब मेरे साथ के लड़के मेरे उपर हँसने लगे तो मैंने इस तथ्य को समझने के बजाय रट (याद कर) लिया। जिससे परीक्षा में गड़बड़ ना कर दूँ (लेकिन जब मैं अपने साथ वाले लड़कों से पूछता था कि भाई तुम्हें जनता शासन करती दिखती है क्या ? तो कन्फयूज तो वो भी होते थे लेकिन सुन के फिर हँस के टाल देते थे)। क्योंकि पिछले साल के पेपरों मे मैंने देखा था ये प्रश्न बहुत बार पूछा जाता था। आप्शन में तीन चार और देशों के नाम दे देता था पेपर बनाने वाला और मेरा दिमाग भन्ना जाता था। क्योंकि मुझे भारत का समझने में इतनी आफत थी तो मैं अमेरिका , इग्लैंण्ड, और आस्ट्रेलिया तो बहुत दूर की बात थी। तब भगवान नाम की एक सत्ता हुआ करती थी जिस पर बड़ा अडिग विश्वास था (जिससे मैंने दम लगाकर सिफारिश की थी कि हे भगवन् ये प्रश्न परीक्षा में ना आये)। लेकिन जैसे ही परीक्षा में दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र और पुराना लोकतंत्र करके दो प्रश्न आये और यही चार आप्शन (विकल्प) थे - भारत, अमेरिका, इग्लैंण्ड, आस्ट्रेलिया। मेरा काम तमाम हो गया और उस सत्ता का मोह भी जाता रहा । ये तो जानता था कि लोकतंत्र में जनता शासन करती है। (रट लिया था तो याद था )। लेकिन ये बडा़ और सबसे पुराना लोकतंत्र देखकर मुझे चक्कर आ गया। उस सदमें ने मुझे इतना हिलाया कि दोबारा सामाजिक विज्ञान या आर्ट विषयों की तरफ मुँह करके भी नहीं देखा मैंने।

लेकिन कई सालों बाद इस डर से उबरने के लिए मैंने राजनीति शास्त्र से एम0 ए0 (पी0जी0) किया। लेकिन अभी तक मुझे समझ नहीं आया कि जनता शासन करने कब आती है ? अब तो मैं वोटर भी बन चुका हूँ।

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