Sunday, July 3, 2016

’इस्लाम’, ’हिन्दुत्व’ और ’भारतवाद’ की किचकिच -

अभी ढ़ाका में हुए चरमपंथी हमले को लेकर इस्लाम और मुसलमान पर एक बार फिर सवाल उठ खड़े हुए हैं। यह बात ठीक है कि बांग्लादेश में कट्टर मुस्लिमों को जब से फाँसी पर चढ़ाया जाना शुरू हुआ है तब से इस तरह के हमले में तेजी आयी है। लेकिन फिर भी जो समझदार मुस्लिम युवा और अन्य मुस्लिम हैं उन्हें अब यह समझना चाहिए कि बिना बोले अब काम नहीं चलेगा। आप धीरे धीरे और थोड़ा ही बोलिये, लेकिन बोलिये। मैं भी बोलूंगा लेकिन मेरा बोलना ’हिन्दू’ होने की वजह से कूड़ेदान में डाल दिया जायेगा। बांग्लादेश जैसे देश में उदार मुस्लिम ब्लागर अगर इतने प्रभावी हो सकते हैं तो भारत में क्यों नहीं ?
आप सीरिया, अफगानिस्तान, ईराक में मुस्लिमों की आतंकी वारदातो के लिए अमेरिका को जिम्मेदार ठहरा सकते हैं और ये वाजिब भी होगा। लेकिन ईस्लाम के नाम पर इतना खून खराबा हो रहा है जैसे मानो इस्लाम का अस्तित्व खतरे में है।
पूरे विश्व में इस्लाम के मानने वालों की संख्या 1.6 बिलियन के साथ दूसरे नम्बर पर है। पहले नम्बर पर क्रिश्चियन 2.2 बिलियन है। क्या पूरे विश्व में मुस्लिम अपने आप को अल्पसंख्यक समझते हैं ? आईसिस की विचारधारा की पैरवी करने वाले ज्यादातर शिक्षित मुस्लिम युवा ही दिख रहें हैं। अखिर ये रिक्तता कहाँ पैदा हो रही है ?
जहाँ तक भारत की बात है तो ’समान नागरिक संहिता’ से लेकर ’तीन बार तलाक’ के मुद्दे तक मुस्लिम खुलकर सामने क्यों नहीं आ रहा है ? समान नागरिक संहिता पर अगर भाजपा और आरएसएस का षडयंन्त्र दिखता है तो आप उसका भंण्डाभोड कुछ वजनदार और वैज्ञानिक तर्कों से करिये ना कि बस अल्पसंख्यक होने और अनुच्छेद 25 और धर्म को मानने की स्वतंत्रता की आड़ लेकर। जितना आप चीजों को उलझाने के लिए संविधान के ’ग्रे एरिया’ का सहारा लेंगे उतना ही आप उलझते जायेंगे और ’अनिर्णय की स्थिति’ का शिकार होंगे। क्योंकि यहाँ पर हर कोई आपको उलझाने के लिए ही बैठा मिलेगा। समाधान कोई नहीं चाहता। समाधान निकलने से बहुत से लोग बेरोजगार हो जायेंगे।
ठीक उसी तरह अगर राम मन्दिर बन गया तो प्रवीण तोगड़िया से लेगर सुब्रहमण्यम स्वामी , विनय कटियार, और ना कितने साध्वियों और धर्म उद्धारकों की पब्लिसिटी की दुकान बन्द हो जायेगी और ना जाने कितने अकुशल लोगों का रोजगार छिन जायेगा जिन्हे केवल राम मन्दिर की ईटें तराशना आता है।
उसी तरह आप मुस्लिम लाॅ पर्सनल बोर्ड में आपके मुस्लिम धर्म के ठेकेदार जो बैठे हैं उन्हे जितनी जल्दी हो सके अप्रासंगिक साबित करिये। ये लोग दीमक हैं जो धीरे धीरे इस्लामियत और कुरान की सकारत्मकता को चाट रहें हैं। एक और बात यह है कि अगर कुरान में कुछ ऐसा लिखा है जो आज के समय में फिट नहीं बैठता तो उसको आगे बढ़कर खुलकर नकार दीजीये। ईस्लाम उससे समृद्ध ही होगा।