Tuesday, May 10, 2016

दारूण अनुनाद-

आरक्षण की बढ़ती माँग से हमारी राजनीति और नेताओं के चेहरे अपने-अपने हित को देखकर भले ही खिल रहे और मायूस हो रहे हों लेकिन देश अगर जीवंत रूप में होता तो इसकी हालत देख नहीं पाते हम लोग। आरक्षण जिस उद्देश्य से दिया गया वह तो वह पूरा होता दिख नहीं रहा है और इस समस्या के जितने विकल्प बुद्धिजीवियो और सिविल सोसाइटी के द्वारा दिखाये जा रहे है उनके नीति के रूप में नियमित होने की कोई गुंजाईश ही नहीं दिख रही है। सवाल आज इसका नहीं है कि आरक्षण सही है या गलत। सवाल ये है कि जो चल रहा है वह कितना सही और और कितना गलत है। आज राजनीतिज्ञों के लिए यह चै|रस का खेल बन गया है।
इस विमर्श को अब दलित और सवर्ण मानसिकता से हटकर एक नागरिक की मानसिकता से देखने की जरूरत है। क्योंकि हमारा शायद अन्तिम उद्देश्य भी सामान्य रूप से अपनी पहचान नागरिक के रूप में तय करने का है ना कि सवर्ण और दलित के रूप में। हाँ, जाति की हकीकत क्या है यह मुझे अच्छी तरह पता है। लेकिन फिर भी इस जातीय विदू्रपता के बावजूद हम एक नागरिक बनने के लक्ष्य से विमुख नहीं हो सकते। चाहे यह मार्ग अन्तहीन ही क्यों ना हो।
चाहे वह हरियाणा का जाट आन्दोलन हो, राजस्थान में गुर्जर, या हार्दिक पटेल के द्वारा आह्वानित किये जा रहे पटेलों की समस्या, इन सारे उदाहरणों से ऐसा लग रहा है कि मौजूदा समय में आरक्षण देने के जो भी उपक्रम हम कर रहे है उससे सामाजिक समता लाने का यह उपक्रम कहीं बैक फायर करके सामाजिक विषमता लाने का कार्य ना कर दे। ऐसा इसलिए क्योंकि धीरे-धीरे अन्य जो सशक्त जातियां और भी है सामाजिक-आर्थिक सूचकांक जिनका गड़बड़ा रहा है, उनमें अब सुगबुगाहट बढ़ती जा रही है। और सरकारी संपत्तियों को हानि पहुँचाकर अपनी बात सरकार से मनवाने वाली प्रेरणा देने के लिए हरियाणा के जाट और हमारे हार्दिक पटेल काफी है। तो मसला ये है कि सामाजिक विद्रोह के लिए जहाँ बस एक चिंन्गारी काफी है जबकि यहाँ तो बाकायदा ध्वजवाहक और मेन्टोर तैयार बैठे हैं आपको रास्ता दिखाने के लिए।
हल क्या है ?
1.हल के रूप में सबसे पहली जरूरत जो कदम उठाने की है वह यह कि एक ऐसा मानदंड निर्धारित हो जिसके तहत उन लोगों को या जातियों को निकाला जाय जिनकी सामाजिक और आर्थिक स्थ्तिि तय मानदंड के अनुरूप हो चुकी है। और निकालने का अर्थ यह ना हो कि हमेशा के लिए निकाल दिया जाय। जरूरत पड़ने पर फिर उनको सम्मिलित करने का रास्ता साफ हो।
2.यह तय करना बहुत जरूरी है कि आकड़े जाति के आधार पर लिये जाय या उनकी आर्थिक सामाजिक स्थिति को देखकर। जिसके भी आधार पर लिये जायें उसमें मेरे हिसाब से सामाजिक स्थ्तिि पर जोर और प्राथमिकता ज्यादा रहे।
3. हमारे दलित चिंतको और दलित विमर्शी मित्रों को यह विश्वास दिलाने की जरूरत है कि आरक्षण नीति की समीक्षा का मतलब आरक्षण का सफाया नहीं है। कोई भी गंभीर सरकार यह बचकाना कदम नहीं उठा सकती अगर भारत जैसे देश की सत्ता में आज के समय में बने रहना है तो। यह राजनीतिज्ञों की करतूतों से हम इतने घबरा जाते हैं।
4. सामाजिक स्थिति के आधार पर लाभ पहुँचाने की बात की जाती है यह तर्क दिया जाता है कि सामाजिक स्थिति निर्धारित करने का तरीका और विधि क्या होगी ? तो उसका जबाब यह है कि हाशिये पर खड़े समुदायों की कम से कम स्नातक स्तर तक शिक्षा, स्वाथ्य और घर की माकूल व्यवस्था करने की जो सरकारे खानापूर्ति करती है। इसको एक मार्केटिग कम्पैन की तरह चलाने की जरूरत है। और ठोस परिणाम निकलने हेतु सम्बन्धित अधिकारियों की कठोर जबाबदेही सुनिश्चित हो। जागरूकता ही इसकी कुंजी है।
5.सामाजिक स्थिति सुधारने का एक पक्ष यह भी है कि अगर आर्थिक हालात सुधरते है तो उसी अनुपात में सामाजिक स्थिति में भी सुधार होता है। क्योंकि आपकी आत्मनिर्भरता बढ़ती है। जहाँ गुलामी खत्म होती है।
6.जाति वाद, छुआछूत , नस्लवाद, भाई-भतीजावाद, आर्थिक एकाधिकारवाद , यह सब ’’सम्भ्रान्त असभ्यता ’’ के गुण है जिन्हे खोखली यथोचितता के आधार पर संस्कृति और व्यवहारिकता का जामा पहनाकर औचित्यपूर्ण ठहराया जाता है। इसलिए एक ऐसे अनवरत सामाजिक कैम्पैन की आवश्यकता है जो इन समूहो से आने वाली सभी आवाजो को हतोत्साहित करे। और सही दिशा में उनका प्रबोधन करें।

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