मुझे शब्द दे दो मैं कहीं भी रह लूँगा।
गिरि , खोह , वन प्रान्तर
कहीं भी ,
क्योंकि शब्दों के लिए मनुष्य जरूरी नहीं होते,
पेड़ पौधे पशु-पक्षाी -
वे भी समझते हैं कि हम उनकों कितना समझा पाते हैं,
इसिलिए मैं सारे कष्ट सह लूंगा , पर -
मुझे शब्द दे दो मैं कहीं भी रह लूंगा।।
जब से मानवों ने पेड़ों के जंगल काटने प्रारम्भ किये और
कंक्रीट के जंगल बनाये,
स्वार्थ हित पशुवध किया-
तब से इन्होंने बोलना बन्द कर दिया है-
मुझे इनके बीच कर दो मैं बात कर लूंगा,
पर मुझे शब्द दे दो मैं कहीं भी रह लूंगा।।
चाहूँ तो शब्दों से अकूत सम्पत्ति बटोर लूं,
इम्पोर्टेड गाडि़यों में चलूं,
पर यह शब्दों के साथ बलात्कार होगा,
और शब्द मेरे लिए अखण्ड, अनन्त और निष्प्रपंच हैं ,
मुझे वह बल दो प्रभु जिससे अपनी सत्ता को शब्द की सत्ता के साथा एकाकार कर सकूँ।
शब्द में विलीन हो जाऊँ
तभी मेरी मुक्ति है,
ले लो मैं सब कुछ दे दूगाँ, पर-
मुझे शब्द दे दो , मैं कहीं भी रह लूंगा।।
लेखक- आशुतोष शुक्ल ’स्थाणु’
गिरि , खोह , वन प्रान्तर
कहीं भी ,
क्योंकि शब्दों के लिए मनुष्य जरूरी नहीं होते,
पेड़ पौधे पशु-पक्षाी -
वे भी समझते हैं कि हम उनकों कितना समझा पाते हैं,
इसिलिए मैं सारे कष्ट सह लूंगा , पर -
मुझे शब्द दे दो मैं कहीं भी रह लूंगा।।
जब से मानवों ने पेड़ों के जंगल काटने प्रारम्भ किये और
कंक्रीट के जंगल बनाये,
स्वार्थ हित पशुवध किया-
तब से इन्होंने बोलना बन्द कर दिया है-
मुझे इनके बीच कर दो मैं बात कर लूंगा,
पर मुझे शब्द दे दो मैं कहीं भी रह लूंगा।।
चाहूँ तो शब्दों से अकूत सम्पत्ति बटोर लूं,
इम्पोर्टेड गाडि़यों में चलूं,
पर यह शब्दों के साथ बलात्कार होगा,
और शब्द मेरे लिए अखण्ड, अनन्त और निष्प्रपंच हैं ,
मुझे वह बल दो प्रभु जिससे अपनी सत्ता को शब्द की सत्ता के साथा एकाकार कर सकूँ।
शब्द में विलीन हो जाऊँ
तभी मेरी मुक्ति है,
ले लो मैं सब कुछ दे दूगाँ, पर-
मुझे शब्द दे दो , मैं कहीं भी रह लूंगा।।
लेखक- आशुतोष शुक्ल ’स्थाणु’
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