जिस तरह से हमारे देश में जेएनयू से लेकर लुटियन्स दिल्ली, जादवपुर यूनिवर्सिटी, लखनऊ यूनिवर्सिटी, जम्मू-कश्मीर आदि हिस्सों मे वैचारिकता और भावनात्मकता की आग लगी हुई है इसमें अपने आप को शामिल करते हुए दूसरों को और अपने को बिना जले कैसे निकाला जाय, समझ नहीं आ रहा। एक नागरिक के तौर पर सरकार ( सरकार से मतलब भाजपा नही) के साथ जाना चाहूँगा और एक विचारशील व्यक्ति के तौर पर मैं रवीश कुमार, सिद्धार्थ वरदराजन, अरून्धती राय, प्रो आनन्द कुमार और उन सारे लोगों के साथ खड़ा होना चाहूँगा जो जेएनयू की विरासत पर गर्व करते हैं और सामाजिक सुरक्षा के मामलों में वामपंथी विचाधारा का समर्थन करते हैं।
सरकार के साथ इसलिए जाना चाहूँगा कि अगर मै सरकार की जिम्मेदारी लिए होता तो किसी समूह की वैचारिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने की बजाय उस समूह की सुरक्षा को तवज्जो देता। मैं सुरक्षा शब्द जोर देना चाहूँगा क्योंकि सरकार की इस मामले पर इसलिए आलोचना हो रही है क्योंकि सुरक्षा एजेंन्सियों की तत्परता और फुर्ती जो अभी तक परदे के पीछे या अपरोक्ष हुआ करती थी वह जेएनयू वाले मामले में पटल पर आ गयी। नागरिको की सुरक्षा सुनिश्चित करने के चक्कर में सरकार फँस गयी। इसमें हमें सुरक्षा एजेन्सियों के उन उपलब्ध संसाधनों पर ध्यान देने की जरूरत है जो कि हमारी सुरक्षा करने के लिहाज से बहुत ही सीमित हैं। इसीलिए कहीं कुछ बहुत बड़ी गड़बड़ ना हो जाय , इस बदहवासी में सुरक्षा एजेंन्सियों ने अतिसक्रियता दिखा दी। और उस बदहवासी की सबसे बड़ी वजह उन नारों की भाषा थी। जिसमें देश के टुकड़े करने की बात कही गयी।
विचारशील व्यक्ति के तौर पर मैं जेएनयू वालों और उन सभी पत्रकारों, प्राफेसरों और अपने विद्यार्थी दोस्तों के साथ हूँ क्योंकि मैं यह मानता हूँ अगर मेरे देश में (जो वर्तमान में देश की प्रचलित परिभाषा है) इसकी सीमा के भीतर माओवाद नक्सलवाद या किसी भी विचारधारा का आधार लेकर कुछ लोग अगर हिंसा करने पर उतारू हो गये तो यह मेरी , सरकार की नाकामी और नाकारापन है कि हम ’पब’ और ’बार’ और मंगल तक बढ़ गये और हमारे उन देशवासियों ( जिन्हे आज हम नक्सली कहते हैं ) के क्षेत्रांे केे प्राकृतिक संसाधनों से होने वाली मोटी कमाई से जिन्होंने ब्रिटेन में घर बना लिया और लास वेगास और पेरिस में बैठकर आज दारू पीते हैं उनके हाथों मे हम (सरकार और अनभिज्ञ जनता) तब भी नाच रहे थे और आज भी नाच रहें हैं। जहाँ तक रही माओ और माक्र्स की बात तो ये सारे लोंगो एक समाज की बेहतर परिकल्पना के परिप्रक्ष्य में हजार ऐसी बातें बताई है जिन्हें अपना लिया जाता तो शायद आज किसी को कोई दर्द ही नहीं होता। (लेकिन मेरा यह सोचना ठीक वैसा ही है जैसा कि प्लेटो ने समाज की कल्पना में कहा कि सारी औरतें सबकी बीबी हों और सभी बच्चे सबके बच्चे हों।) लेकिन माओ और माक्र्स की हिंसा और क्रान्तिकारी विचारधारा वाले हिस्से को पकड़कर पूरे माक्र्सवाद और माओवाद की लोकतंत्र की वेदी पर बलि दे दी जाती है। जैसे लगता है माओ कोई डाकू था। अगर इतनी ही समस्यायें हैं माक्र्स और माओ से है तो सारी सरकारें क्यों नहीं माक्र्स और माओ की किताबों पर बैन लगा देती। लोग क्यों यह भूल जाते हैं कि जिस लोकतंत्रात्मक गणराज्य को आज हम इतना पूजते है , उसकी बुनियाद में कई सारी महत्वपूर्ण ईटों माक्र्सवाद की लगी हैं। जिसकी प्रशंसा में इग्लैंण्ड , अमेरिका और हम अघाये रहते हैं।
इस सब के बाद भी हमें सुरक्षा एजेंसियों की व्यवहारगत और संसाधनगत मजबूरी को समझना होगा क्योंकि जिस तरह आतंकवाद दुनिया की नाक में दम करके बैठा और आतंकियों के मंसूबे पता चलते ही रूह थर्रा जाती है वहां पर हमें पहले अपनी सुरक्षा को तरजीह देनी होगी दूसरे पायदान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को रखना पड़ेगा।
No comments:
Post a Comment