Friday, January 16, 2026

आदमखोरों के झंडे

 आदमखोरों के झंडे


वह सूखता जा रहा था 

अपने अंतस में 

जो अब तक ज़िंदा था 

अपनी जिज्ञासाओं के दम पर 

अर्थहीनता अपने पंजे गड़ा चुकी थी 

सभी तरह के अर्थों की सार्थकता पर 

सांत्वनाएँ भरसक कोशिश कर रही थीं  

उसे  आशान्वित बनाये रखने की 

उसे  सपने आना शुरू हो चुके थे 

काफ़्का के , मुक्तिबोध के 

कभी कभी एक फ़्लैशबैक जैसा

आदमख़ोरों का एक झुंड आता था उसके सपने में 

उनके हाथ में झंडे होते थे 

उन झंडों में खुदा होता था 

Banality, Absurdity, Mediocrity 


@शुभांकर

Friday, January 2, 2026

मैं नए साल का जश्न मनाना चाहता हूँ

 मैं नए साल का जश्न मनाना चाहता हूँ



मुझे चिंता है 

दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण को लेकर 

महिलाओं के ख़िलाफ़ बढ़ते अपराध को लेकर 

बलात्कारियों की शीर्ष अदालतों से रिहाई को लेकर 

NCRB की रपटों में प्रतिवर्ष अपराध के बढ़ते ग्राफ को लेकर  

मुझे चिंता है 

इस नववर्ष के अवसर पर देश के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर  में गंदा पानी पीने से बच्चों की होती मौतों पर 

और उस पर एक कैबिनेट मंत्री की असंवेदनशीलता पर 

मुझे चिंता है 

देश में बढ़ती नस्लीय और धार्मिक हिंसा को लेकर 

मैं इन सारी चिंताओं को अपने देश की जनता को चुनाव का दिन याद कराते हुए उसके मुँह पर दे मारना चाहता हूँ 

और अपराधबोध के साथ ही सही लेकिन नए साल का जश्न मनाना चाहता हूँ   ।।


@शुभांकर



Saturday, July 12, 2025

भोगवादी निष्क्रियता

  समाज में सचेत नागरिकों की कमी से  भोगवादी निष्क्रियता के लक्षण मिलने शुरू हो जाते हैं । उदाहरण के तौर पर - मान लो, कोई नागरिक अपने देश में बढ़ती आय-असमानता, बेरोजगारी, सेंसरशिप, या शोषण को देख रहा है। लेकिन उसके पास Netflix है, AC है, खाना है, इंस्टाग्राम है, जवान अवस्था में थोड़ा बल है (जो उसे लगता है है ये सदैव रहेगा ) तो वो सोचता है “मुझे क्या फर्क पड़ता है ? मैं क्यों लड़ूं या बोलूं?” यही है भोगवादी निष्क्रियता । 

हर्बर्ट मार्क्यूज़ (Herbert Marcuse) ने अपने लेख “One-Dimensional Man” में इसका ज़िक्र किया कि आधुनिक पूँजीवाद इंसान को “comfortable slavery” में डाल देता है । गांधी भी इसे अपने समय में “ब्रह्मचर्य और त्याग” के ज़रिए चुनौती देते थे — कि भोग से मुक्ति ही आत्मा की सक्रियता को जन्म देती है । भारतीय जीवन दर्शन में तो “त्याग” के मूल्य का इसीलिए  इतना महत्व था । इसीलिए RSS जैसे सामाजिक  संगठन या इससे मिलते जुलते सामाजिक संगठन और पारंपरिकता की वकालत करने वाले प्रबुद्ध दक्षिण पंथी लोग जब इन सब मामलों में पाश्चात्य जगत की आलोचना करते हैं तो उसमें substance होता है ।


Saturday, June 14, 2025

पिता से प्रतिद्वंद्विता

पिता से शिकायती स्वर रहा 

हर बातचीत में 

जीवन में लगने वाली हर कमी के 

सदैव जिम्मेदार दिखे पिता 

वह अपने जीवन और अनुभव का संघर्ष 

परोसते रहे अनवरत 

मेरे ध्यान से ना सुने जाने के बावजूद 

पर सब कुछ था मेरे काम का 

जो नहीं सुना गया 

उन्होंने चुपचाप ली जिम्मेदारी 

मेरे जीवन के हर अधूरेपन की 

वह बहुत बातूनी थे 

पर इस मसले पर शायद कभी उन्होंने बोला हो 

मैं अपने संघर्षों को उनके संघर्षों से तौलता रहा

और सदैव ऊपर रखता रहा अपने संघर्षों को 

मेरी उम्र जैसे-जैसे बढ़ती गई 

उनके संघर्षों की विराटता बढ़ती गई 

उनकी एक ईमानदार और सच्ची सलाह मात्र से 

लोग चढ़ते रहे दुनियावी सफलता की सीढ़ियाँ 

पिता के हिस्से आया सिर्फ़ संघर्ष 

वह नहीं सिखा पाये किसी को 

किसी प्रतिद्वंदी की सफलता में खुश होना 

साथ वो सबके थे जैसे एक मनुष्य को होना चाहिए 

बस यही वजह थी उनके संघर्षों के विराटता की 

उन्होंने अपने साथ-साथ सबके लिए किया 

मैंने बस अपने लिए किया संघर्ष 

मेरा दौर आते आते मनुष्यता की सामान्य समझ सिमट कर यही रह गई थी शायद ,

और मैं पिता नहीं था ।।


@ शुभांकर

Sunday, December 29, 2024

ओ GEN - G , Alpha, Beta सुनो !

 ओ GEN - G , Alpha, Beta सुनो  !

तुमसे ये मिलेनियल कुछ कहना चाहता है 

जब हम तुम्हारी उम्र के थे तो उन्होंने हमारे समय में एक मस्जिद तोड़ी थी 

अब फिर से वो एक अगली मस्जिद तोड़ने की फ़िराक़ में हैं 

तुम उनके झाँसे में आकर उनका साथ देने मत जाना 

हम गर्वातिरेक में उस मस्जिद की एक एक ईंट उठाकर अपने-अपने घर ले आये थे 

अयोध्या में हम ईंटे बीन रहे थे और पश्चिम वाले इंटरनेट ला चुके थे और गूगल - सर्च इंजन बनाने में लगे हुए थे

इधर हमने 2002 में गोधरा और गुजरात जलाया 

उधर 2004 में गूगल ने G-mail लांच कर दिया और उसी वर्ष  फ़ेसबुक भी आया 

और फ़ेसबुक लाने वाला एक 20 साल का हमारे जैसा नौजवान था

ये सब करके हम जैसे ही दुनिया में हो रही प्रगति से रूबरू हो ही रहे थे कि 

तब तक एक शिकारी नेता इस देश की नासूर हो चुकी समस्या भ्रष्टाचार के ख़ात्मे के वादे के साथ 

2012 में हमसे आंदोलन करवाया  

2-3 साल हमारे उसमें गये 

हम उसके झाँसे से उबर ही रहे थे कि 2014 में 

एक नेता तपस्वी के लबादे में आया हमारी पीड़ा दूर करने के अनगिनत वादों के साथ 

वो समझ गया कि हम मिलेनियल अपने स्व की पहचान के संकट से जूझ रहें हैं 

उसने तुरत हमें विश्वगुरु बनने का ढोंग समझाया 

हम काफ़ी खुश हुए क्योंकि हमारे स्व को एक फ़ौरी लेकिन खोखली पहचान उसने दे दी 

उसके बाद भी हमारी उमर खपती रही और कुछ बदलाव नहीं आया 

तो हमने अपने पुरुषार्थ से IT में लामें-नेरे प्रगति की 

भले ही वो देश के दक्षिणी हिस्से तक ही सीमित रही 

हम आगे बढ़ ही रहे थे कि 2019 में 

फिर से वो मस्जिद का जिन्न बाहर लाया 

इस बार मंदिर बनाकर उसने हमें सभ्यताई गौरव का झुनझुना पकड़ाया 

हम उसकी बातों से फिर से ओत-प्रोत थे 

वो सिलिकन वैली में जाकर सभी भारतवंशियों को हमारे देश बुलाया 

और हमें बताया कि देखो तुम्हारा भाई विश्वगुरु है 

हम फिर से बेहद खुश थे बग़ैर ये दिमाग़ लगाये कि सब अमेरिकी नागरिक हैं 

जब तक हम ये सब हम टटोल पाते तब तक पश्चिम Chat-जीपीटी लेकर आ गया 

तुम्हें यह बताना था इन 35-40 सालों में हुए क्रांतिकारी अविष्कारों में हमारी कहीं कोई हिस्सेदारी नहीं है 

यहाँ मुझे अपनी पहचान का संकट दिख रहा 

यहाँ मेरा आत्म गौरव लहुलुहान है 

मेरी उम्र खप चुकी है । यही सब बताना था । 

ठीक हमारे समय की तरह फिर से उसने एक दूसरी मस्जिद पर तुम्हारे बलबूते दावा ठोका है । मत जाना ।

तुम्हें मेरी बात झूठी लगे तो जाओ पढ़ो जॉर्ज ओर्वेल , कामू , काफ़्का और फूको को 

मुक्तिबोध , धूमिल , नागार्जुन , अज्ञेय और यश मालवीय को  ॥

Chat-Gpt - 4 आ चुका है ।


@ शुभांकर

तुम्हारे साथ का बल

तुम मेरे साहस का वह स्रोत हो जिसके दम पर मैं जीवन की किसी भी परीक्षा में बैठने की विवशता से ख़ुद को मुक्त कर सकता हूँ 

ऐसा बचपन से मैं माँ के आश्वासन के बल पर करता आया हूँ 

दुनियावी परीक्षा तंत्र  मुझे डिज़र्व नहीं करता 

इसलिए उसमें शामिल ना होकर मैंने अपनी साख बचा ली है 

अभी हाल हाल में मुझे भान हुआ कि अपने भीतर के परीक्षार्थी का मैं स्वयं परीक्षक रहा ताउम्र 

मुझे माँ ईश्वर से ज़्यादा हिम्मती लगती रहीं हैं

हालाँकि बक़ौल माँ , ये मेरा फ़ितूर है 

लेकिन तुमसे मिलने पर मुझे ईश्वर को मानने पर बाध्य होना पड़ा है

यही वह विषय था जिसको लेकर माँ से मेरी हमेशा अनबन रही 

पर माँ शायद हमेशा से सही थीं , सही हैं , पता नहीं ॥

03: 30 AM , 30-12-2024

~ शुभांकर

विश्वगुरु बनने का आडम्बर

तुम विश्वगुरु बनने का आडंबर शुरू करो 

और पुरुषार्थ का वमन कर चुके नौनिहालों का एक आक्रोशित समूह तैयार करो 

मैं चलता हूँ जरा पता करता हूँ आज हमारे देश में प्लास्टिक का उत्पादन कितना बढ़ा ?

अख़बार में आँकड़ा निकालता हूँ कि भारत सहित दुनिया में प्रति परिवार कार्बन उत्सर्जन कितना बढ़ा ?

अपने देश की राजधानी दिल्ली में बदतर होते वायु प्रदूषण से देशवासियों की कम होती औसत आयु पर मुझे एक लेख भी लिखना है 

और अपने देश सहित दुनिया में लिखे जा रहे साहित्यों में जलवायु परिवर्तन पर व्यक्त चिंताओं से अपने को रूबरू भी करवाना  है

दुनिया के ठेकेदारों ने पृथ्वी पर उपलब्ध स्थल भूभाग के कितने प्रतिशत  हथिया ली है ज़मीन ? अभी मुद्दा ये भी है

गरीबी और भुखमरी ठीक-ठीक नापने  का कोई आसान सा फार्मूला आज तक क्यों नहीं बन पाया अपने देश में ? 

मुझे पढ़ने हैं अभी उस पर कई सारे शोध-पत्र  

इसके अतिरिक्त मुझे अपने सीखने के लिए पता करना है अभी आर्टिफ़िशियल इंटेलीजेंश की कोई वर्कशॉप 

जिसमें ज़ाहिर है एक्सपर्ट होगा कोई विदेशी प्रोफ़ेसर सच में विश्वगुरु के माफ़िक 

बिना अपनी गुरुता के गर्वबोध में पगा हुआ 

वर्कशॉप के बाद ले जाएगा उन सभी प्रतिभाओं को अपने देश और फिर से कर देगा तुम्हें विवश और विकल एक आक्रोशित झुंड बनाने के लिए 

और फिर तुम्हारे पास अपनी खोखली साख बचाने को रह जाएगा विश्वगुरु बनने का आडंबर ॥

  [2:28 am, 30/12/2024]  


~ शुभांकर