तुम मेरे साहस का वह स्रोत हो जिसके दम पर मैं जीवन की किसी भी परीक्षा में बैठने की विवशता से ख़ुद को मुक्त कर सकता हूँ
ऐसा बचपन से मैं माँ के आश्वासन के बल पर करता आया हूँ
दुनियावी परीक्षा तंत्र मुझे डिज़र्व नहीं करता
इसलिए उसमें शामिल ना होकर मैंने अपनी साख बचा ली है
अभी हाल हाल में मुझे भान हुआ कि अपने भीतर के परीक्षार्थी का मैं स्वयं परीक्षक रहा ताउम्र
मुझे माँ ईश्वर से ज़्यादा हिम्मती लगती रहीं हैं
हालाँकि बक़ौल माँ , ये मेरा फ़ितूर है
लेकिन तुमसे मिलने पर मुझे ईश्वर को मानने पर बाध्य होना पड़ा है
यही वह विषय था जिसको लेकर माँ से मेरी हमेशा अनबन रही
पर माँ शायद हमेशा से सही थीं , सही हैं , पता नहीं ॥
03: 30 AM , 30-12-2024
~ शुभांकर
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