समाज में सचेत नागरिकों की कमी से भोगवादी निष्क्रियता के लक्षण मिलने शुरू हो जाते हैं । उदाहरण के तौर पर - मान लो, कोई नागरिक अपने देश में बढ़ती आय-असमानता, बेरोजगारी, सेंसरशिप, या शोषण को देख रहा है। लेकिन उसके पास Netflix है, AC है, खाना है, इंस्टाग्राम है, जवान अवस्था में थोड़ा बल है (जो उसे लगता है है ये सदैव रहेगा ) तो वो सोचता है “मुझे क्या फर्क पड़ता है ? मैं क्यों लड़ूं या बोलूं?” यही है भोगवादी निष्क्रियता ।
हर्बर्ट मार्क्यूज़ (Herbert Marcuse) ने अपने लेख “One-Dimensional Man” में इसका ज़िक्र किया कि आधुनिक पूँजीवाद इंसान को “comfortable slavery” में डाल देता है । गांधी भी इसे अपने समय में “ब्रह्मचर्य और त्याग” के ज़रिए चुनौती देते थे — कि भोग से मुक्ति ही आत्मा की सक्रियता को जन्म देती है । भारतीय जीवन दर्शन में तो “त्याग” के मूल्य का इसीलिए इतना महत्व था । इसीलिए RSS जैसे सामाजिक संगठन या इससे मिलते जुलते सामाजिक संगठन और पारंपरिकता की वकालत करने वाले प्रबुद्ध दक्षिण पंथी लोग जब इन सब मामलों में पाश्चात्य जगत की आलोचना करते हैं तो उसमें substance होता है ।