Saturday, June 14, 2025

पिता से प्रतिद्वंद्विता

पिता से शिकायती स्वर रहा 

हर बातचीत में 

जीवन में लगने वाली हर कमी के 

सदैव जिम्मेदार दिखे पिता 

वह अपने जीवन और अनुभव का संघर्ष 

परोसते रहे अनवरत 

मेरे ध्यान से ना सुने जाने के बावजूद 

पर सब कुछ था मेरे काम का 

जो नहीं सुना गया 

उन्होंने चुपचाप ली जिम्मेदारी 

मेरे जीवन के हर अधूरेपन की 

वह बहुत बातूनी थे 

पर इस मसले पर शायद कभी उन्होंने बोला हो 

मैं अपने संघर्षों को उनके संघर्षों से तौलता रहा

और सदैव ऊपर रखता रहा अपने संघर्षों को 

मेरी उम्र जैसे-जैसे बढ़ती गई 

उनके संघर्षों की विराटता बढ़ती गई 

उनकी एक ईमानदार और सच्ची सलाह मात्र से 

लोग चढ़ते रहे दुनियावी सफलता की सीढ़ियाँ 

पिता के हिस्से आया सिर्फ़ संघर्ष 

वह नहीं सिखा पाये किसी को 

किसी प्रतिद्वंदी की सफलता में खुश होना 

साथ वो सबके थे जैसे एक मनुष्य को होना चाहिए 

बस यही वजह थी उनके संघर्षों के विराटता की 

उन्होंने अपने साथ-साथ सबके लिए किया 

मैंने बस अपने लिए किया संघर्ष 

मेरा दौर आते आते मनुष्यता की सामान्य समझ सिमट कर यही रह गई थी शायद ,

और मैं पिता नहीं था ।।


@ शुभांकर

No comments:

Post a Comment