आज युद्ध के कैनवस पर
हमारी मानव जाति उकेर रही है
अपने जातीय , नस्लीय , राजनीतिक, सभ्यताई, ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक श्रेष्ठता बोध
सभ्यताओं के पुनर्जागरण में आलिंगनबद्ध मानवीय विवेकशीलता के पतन के काल में
यहाँ आज मैं मानवता के इस युग का शोक गीत सुनाने आया हूँ
हाँ , हाँ मेरे भविष्य के प्यारे नायकों
मैं तुम्हें ही संबोधित करते हुए कहना चाहता हूँ
कि आज मैं यहाँ मानवता का शोकगीत सुनाने आया हूँ
इसे मात्र मेरी औपचारिक कविता भर मत समझना
युद्ध के दुष्कर्म से आज मानवता का शील खंडित है
मैं हताश हूँ यह सोचकर कि जब इस दुनिया ने नहीं सुना
बुद्ध को , मंडेला को , विवेकानंद और गाँधी को
तो वह कितना सुनेगी मेरे इस शोकगीत को
मैं हताश हूँ दुनिया के उन तमाम चेतना शून्य और भाव शून्य हाकिमों को देखकर
जो सीरिया के समुद्री तट पर औधें मुंह पड़ी आयलन कुर्द की सिसकी को महसूस नहीं कर सके
आज युद्ध के मलबे में दबी मृत माँ के पार्थिव शरीर से लिपटी एक बच्ची की चीत्कारती तस्वीर
मात्र एक खबर बन कर रह जाती है
विकसित , विवेकशील , करुणा , दया , प्रेम जैसे शब्दों एवं पदबंधों ने
मानो समाधिस्थ होने की मुनादी कर दी है दुनिया में
मै आशावान हूँ तो बस अपनी आगे आने वाली पीढ़ियों के नायकों से
जो सबक लेंगे अल्फ्रेड नोबेल और ओपनहाईमर के पश्चातापों से
और दुत्कार देंगे उन सभी सत्तानशीं ताकतों को
जो युद्ध के मकतल पर मानवता को बलि देने का मंसूबा पाले बैठे होंगी
और तब मुझे उम्मीद है दुश्मन की तोप की नाल और मिसाइलों पर चढ़कर
दुनिया की सेनाओं के सभी सिपाही अपने-अपने गर्वीले क्षणों में
समवेत स्वर में गाएगें मेरा ये शोकगीत विजय उद्घघोष के मानिंद
और दुनिया के हुक्काम अपने अपने दफ्तरों से जारी करेंगे युद्ध के स्थगन का प्रस्ताव ।।