Saturday, February 3, 2024

कुंठित गर्वबोध

 चौराहे से चिल्लाओ तुम

अपना देश महान है

पास वहीं आत्महत्या करता

कोई एक किसान है

बहसों में फँस-फँस गिरता है

यहाँ वहाँ मुसलमान है

खपत हो गई मूल्यों की अब

क्या बचा कहीं इंसान है ?

मुद्दे सारे पीछे छोड़ो 

मंदिर की बात बताओ तुम

जितने कट्टर दिख सकते हो

उतना बनकर दिखलाओ तुम

हम चटकारे लेंगे सुनकर 

जितना बोलोगे तुम तनकर

हर बार ठगी के आदी है

इस बार भी ठग लो क्या होगा 

मेरे भविष्य के उद्धारक 

मजबूजरन तुम्हें प्रणाम है।।


#मेरा यूपी महान है


04 फ़रवरी 2017

जिस दिन मेरा चश्मा टूटा

 जिस दिन मेरा चश्मा टूटा 

उसी दिन मैंने अपने नज़रिए की केंचुल छोड़ी

मेरे समक्ष अंतहीन कोरापन था कुछ रच देने को 

मैं जल्दी में था कि बस अब रच ही देता हूँ 

लेकिन मैं सोच नहीं पाया कुछ 

शुरुआत कहाँ से करूँ ?

मेरा वो नज़रिए वाला चश्मा मुझे यही तो बताता था 

मैं बार बार कोशिश में था कि कुछ सोच ले जाऊँ 

मैं सोच नहीं पाया क्योंकि सब कुछ सापेक्ष था  ॥

सब कुछ पहले जैसा क्यों नहीं हो जाता

 " सब कुछ पहले जैसा क्यों नहीं होता" 


मूल की तलाश में रुचि थी उसे 

वह हिरन था 

पर वह उसकी मरीचिका नहीं थी 

वह साबुत शरीर थी 

औऱ उसमें समायी  थी 

मूल की तलाश मरीचिका जैसी थी या नहीं 

वह नहीं जानता था 

लेकिन वह उसको जानता भी था समझता भी था 

मूल की तलाश की जद्दोजहद में 

एक दिन अलग हो गया वो मूल से 

अगले दिन अखबारनवीसों ने छापा 

कि जंगल में शिकारियों ने एक हिरन का शिकार किया 

वहीं हिरन की लाश के पास एक पेड़ जड़ों से उखड़ गया 

उस पेड़ के बाशिंदे  पंछियों ने बताया कि 

हिरन का संसार ये पेड़ था  ॥


@Shubhankar

मेरे अधिकार विहीन सहयात्री

 अधिकारविहीन मेरे वो सहयात्री


मैं अपने अधिकारों को अखबारों और किताबों में पढ़ता हूँ

पहले के रहनुमाओं ने मेरे बारे में भरपूर दलीले दी हैं

पर मेरे गांव के कच्चे खड़ंजे

और उस पर चलने वाली एक खटारा बस

उसमें मेरे साथ बैठने वाले सहयात्री और कंडक्टर

सबके सब मुझे अधिकारों से वंचित लगते हैं

मुस्कुराते हुए

उनका मुस्कुराना शायद बस मुझे  ही स्याह लगता है

जब मैं पूरा किराया देकर उस ठसाठस भरी बस में खड़े चलता हूं

तो अपने अधिकरों का हरण महसूस करता हूं

उस भीड़ में समझ नहीं आता कि मैं अपने अधिकार मांगू किससे ?

मन करता है उतर जाऊं बस से

पर अगली बस 6 घंटे बाद आयेगी

घर कैसे जाउंगा

मेरे अधिकार कातर मुद्रा में व्यवहारिकता की दबंगई सहते हैं

व्यवहारिकता मेरे अधिकारों को बंधुआ बना लेती है

उस बस में कोई शिक्षा के अधिकार से वंचित दिखता है

तो कोई पोषण के

ज्यादा संख्या समानता के अधिकार से वंचित लोंगो की है

यह अधिकार इतना भ्रमात्मक है कि इसको लाने के 

चक्कर में कई देशों में क्रान्तियां हो गयी

कितने दार्शनिकों ने अपना जीवन खपा दिया

पर मेरे गांव के वो बस के सहयात्री

आज भी इससे वंचित दिखते हैं।

मेरे उस बस में चढ़ते ही असमानता एक पायदान और बढ़ जाती है

फिर मैं घुसड़ मुसड़ के एक यात्री के उतरने पर एक सीट हथिया लेता हूं

अपने बैग से अपना अंग्रेजी अखबार निकालता हूं

और बस के अन्दर की तमाम कचपचाती आवाजों के बीच 

अपने अधिकारो से सम्बन्धित एक और लेख ढूढ़ने लगता हूं

वास्तव में कौन किसके अधिकारों का अतिक्रमण कहाँ कर रहा है ?

यह प्रश्न व्यवस्था के जटिल शारीरिक विज्ञान में छुप जाता है ॥

आँखें

 रोज़ की तरह उसने दरवाज़ा खोला 

वह आवारा कुत्ता उसके सामने था

उसने हाथ से रोटी फेकने के लिये हाथ बढ़ाया 

और अचानक रुक गया 

उसने कुत्ते की आँखों में देखा 

फिर अचानक कोयल की आवाज़ आयी 

उसने मुंडेर पर कोयल की आँखों में देखा 

फिर हवा चली उसने पेड़ की आँखों में देखा 

तभी सारंगी लिए एक सूफ़ी ने दरवाज़े पर दस्तक दी 

उसने सूफ़ी की आँखों में देखा 

सबकी आँखों में देखकर वो बेचैन हो गया 

क्योंकि उन सबकी आँखों में जो था , बस इसकी आँखों में नहीं था 

उसने सूफ़ी से उसकी आँखों की क़ीमत पूछी

सूफ़ी ने मुस्कुराकर सारंगी उठाई और चल पड़ा 

कुत्ता अपनी आँखें लिए आगे आगे चला 

उसके आगे कोयल चली 

सबसे आगे पेड़ चला था अपनी आँखों के साथ  ॥

Friday, February 2, 2024

मानवता का मर्सिया ( शोकगीत )

 आज युद्ध के कैनवस पर 

हमारी मानव जाति उकेर रही है 

अपने जातीय , नस्लीय , राजनीतिक, सभ्यताई, ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक श्रेष्ठता बोध 

सभ्यताओं के पुनर्जागरण में आलिंगनबद्ध मानवीय विवेकशीलता के पतन के काल में 

यहाँ आज मैं मानवता के इस युग का शोक गीत सुनाने आया हूँ 

हाँ , हाँ मेरे भविष्य के प्यारे नायकों 

मैं तुम्हें ही संबोधित करते हुए कहना चाहता हूँ 

कि आज मैं यहाँ मानवता का शोकगीत सुनाने आया हूँ 

इसे मात्र मेरी  औपचारिक कविता भर मत समझना 

युद्ध के दुष्कर्म से  आज मानवता का शील खंडित है 

मैं हताश हूँ यह सोचकर कि जब इस दुनिया ने नहीं सुना 

बुद्ध को  , मंडेला को , विवेकानंद और  गाँधी को 

तो वह  कितना सुनेगी मेरे इस शोकगीत को 

मैं हताश हूँ दुनिया के उन तमाम चेतना शून्य और भाव शून्य हाकिमों को देखकर 

जो सीरिया के समुद्री तट पर औधें मुंह पड़ी आयलन कुर्द की सिसकी को महसूस नहीं कर सके

आज युद्ध के मलबे में दबी मृत माँ के पार्थिव शरीर से लिपटी एक  बच्ची की चीत्कारती तस्वीर

मात्र एक खबर बन कर रह जाती है  

विकसित , विवेकशील , करुणा , दया , प्रेम जैसे  शब्दों एवं पदबंधों ने 

मानो समाधिस्थ होने की मुनादी कर दी है दुनिया में 

मै आशावान हूँ तो बस अपनी आगे आने वाली पीढ़ियों के नायकों से 

जो सबक लेंगे  अल्फ्रेड नोबेल और ओपनहाईमर के पश्चातापों से 

और दुत्कार देंगे उन सभी सत्तानशीं ताकतों को 

जो युद्ध के मकतल पर मानवता को बलि देने का मंसूबा पाले बैठे होंगी

और तब मुझे उम्मीद है दुश्मन की तोप की नाल और मिसाइलों  पर चढ़कर 

दुनिया की सेनाओं के सभी सिपाही अपने-अपने  गर्वीले क्षणों में 

समवेत स्वर में गाएगें  मेरा ये  शोकगीत विजय  उद्घघोष के मानिंद 

और दुनिया के हुक्काम अपने अपने दफ्तरों से जारी करेंगे युद्ध के स्थगन का प्रस्ताव  ।।