अधिकारविहीन मेरे वो सहयात्री
मैं अपने अधिकारों को अखबारों और किताबों में पढ़ता हूँ
पहले के रहनुमाओं ने मेरे बारे में भरपूर दलीले दी हैं
पर मेरे गांव के कच्चे खड़ंजे
और उस पर चलने वाली एक खटारा बस
उसमें मेरे साथ बैठने वाले सहयात्री और कंडक्टर
सबके सब मुझे अधिकारों से वंचित लगते हैं
मुस्कुराते हुए
उनका मुस्कुराना शायद बस मुझे ही स्याह लगता है
जब मैं पूरा किराया देकर उस ठसाठस भरी बस में खड़े चलता हूं
तो अपने अधिकरों का हरण महसूस करता हूं
उस भीड़ में समझ नहीं आता कि मैं अपने अधिकार मांगू किससे ?
मन करता है उतर जाऊं बस से
पर अगली बस 6 घंटे बाद आयेगी
घर कैसे जाउंगा
मेरे अधिकार कातर मुद्रा में व्यवहारिकता की दबंगई सहते हैं
व्यवहारिकता मेरे अधिकारों को बंधुआ बना लेती है
उस बस में कोई शिक्षा के अधिकार से वंचित दिखता है
तो कोई पोषण के
ज्यादा संख्या समानता के अधिकार से वंचित लोंगो की है
यह अधिकार इतना भ्रमात्मक है कि इसको लाने के
चक्कर में कई देशों में क्रान्तियां हो गयी
कितने दार्शनिकों ने अपना जीवन खपा दिया
पर मेरे गांव के वो बस के सहयात्री
आज भी इससे वंचित दिखते हैं।
मेरे उस बस में चढ़ते ही असमानता एक पायदान और बढ़ जाती है
फिर मैं घुसड़ मुसड़ के एक यात्री के उतरने पर एक सीट हथिया लेता हूं
अपने बैग से अपना अंग्रेजी अखबार निकालता हूं
और बस के अन्दर की तमाम कचपचाती आवाजों के बीच
अपने अधिकारो से सम्बन्धित एक और लेख ढूढ़ने लगता हूं
वास्तव में कौन किसके अधिकारों का अतिक्रमण कहाँ कर रहा है ?
यह प्रश्न व्यवस्था के जटिल शारीरिक विज्ञान में छुप जाता है ॥
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