Saturday, February 3, 2024

जिस दिन मेरा चश्मा टूटा

 जिस दिन मेरा चश्मा टूटा 

उसी दिन मैंने अपने नज़रिए की केंचुल छोड़ी

मेरे समक्ष अंतहीन कोरापन था कुछ रच देने को 

मैं जल्दी में था कि बस अब रच ही देता हूँ 

लेकिन मैं सोच नहीं पाया कुछ 

शुरुआत कहाँ से करूँ ?

मेरा वो नज़रिए वाला चश्मा मुझे यही तो बताता था 

मैं बार बार कोशिश में था कि कुछ सोच ले जाऊँ 

मैं सोच नहीं पाया क्योंकि सब कुछ सापेक्ष था  ॥

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