जिस दिन मेरा चश्मा टूटा
उसी दिन मैंने अपने नज़रिए की केंचुल छोड़ी
मेरे समक्ष अंतहीन कोरापन था कुछ रच देने को
मैं जल्दी में था कि बस अब रच ही देता हूँ
लेकिन मैं सोच नहीं पाया कुछ
शुरुआत कहाँ से करूँ ?
मेरा वो नज़रिए वाला चश्मा मुझे यही तो बताता था
मैं बार बार कोशिश में था कि कुछ सोच ले जाऊँ
मैं सोच नहीं पाया क्योंकि सब कुछ सापेक्ष था ॥
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