आदमखोरों के झंडे
वह सूखता जा रहा था
अपने अंतस में
जो अब तक ज़िंदा था
अपनी जिज्ञासाओं के दम पर
अर्थहीनता अपने पंजे गड़ा चुकी थी
सभी तरह के अर्थों की सार्थकता पर
सांत्वनाएँ भरसक कोशिश कर रही थीं
उसे आशान्वित बनाये रखने की
उसे सपने आना शुरू हो चुके थे
काफ़्का के , मुक्तिबोध के
कभी कभी एक फ़्लैशबैक जैसा
आदमख़ोरों का एक झुंड आता था उसके सपने में
उनके हाथ में झंडे होते थे
उन झंडों में खुदा होता था
Banality, Absurdity, Mediocrity
@शुभांकर
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