Friday, January 16, 2026

आदमखोरों के झंडे

 आदमखोरों के झंडे


वह सूखता जा रहा था 

अपने अंतस में 

जो अब तक ज़िंदा था 

अपनी जिज्ञासाओं के दम पर 

अर्थहीनता अपने पंजे गड़ा चुकी थी 

सभी तरह के अर्थों की सार्थकता पर 

सांत्वनाएँ भरसक कोशिश कर रही थीं  

उसे  आशान्वित बनाये रखने की 

उसे  सपने आना शुरू हो चुके थे 

काफ़्का के , मुक्तिबोध के 

कभी कभी एक फ़्लैशबैक जैसा

आदमख़ोरों का एक झुंड आता था उसके सपने में 

उनके हाथ में झंडे होते थे 

उन झंडों में खुदा होता था 

Banality, Absurdity, Mediocrity 


@शुभांकर

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