हमारे वामपंथी भाइयों की यह दलील कि वे दमित, शोषित, पिछड़े, कुचले लोंगों की बात करते हैं , अब धीरे-धीरे सन्देह पैदा करने लगी है। क्योंकि जितना मैंने वामपंथ को पढ़ा उससे यह समझ में आया कि वामपंथियों के लिए उनके समाजवादी राज्य का निर्माण करने वाले सपने के लिए अनुकूल परिस्थितियां भारत में थाल सजाकर बैठी हैं लेकिन यह लोग किस धारा में विचारमग्न हैं यह समझ नही आता।
नवम्बर 1917 में रूसी क्रन्ति के समय जारशाही का अन्त करने के लिए जब बोल्शेविक और मेन्शेविक दो साम्यवादी दल अपनी अलग-अलग राय के चलते अलग हो गये तो उसके पीछे की वजह यही थी कि बोल्शेविक जिसका नेता लेनिन था उसने कहा कि ’जारशाही’ के तख्ता पलट करने के सिवाय किसी और तरह से हमें उससे मुक्ति नहीं मिल सकती उसने कहा कि मजदूरों और किसानों को मिलाकर सैनिकों का एक ऐसा दस्ता तैयार करो जो अन्य लोंगो को क्रान्ति के लिए प्रेरित करे। लेनिन का मानना था कि - ’’ क्रान्ति होती नहीं क्रान्ति की जाती है।’’ लेकिन ठीक इसके विपरीत मेन्सेविकों का मानना था कि अभी हमारे (रूस के) किसान क्रान्ति के लिए तैयार नहीं है। मेन्सेविकों का मानना था समाजवाद का विकास क्रमिक रूप से बिना हिंसा के हो तो ज्यादा अच्छा है। लेकिन लेनिन कहता था कि क्रमिक रूप से विकास करने के चक्कर में ’हम अपने लोगों को पूँजीवादी व्यवस्था के कष्टों से क्यों गुजारें।’ इसलिए क्रान्ति कर दो।
अब आते हैं भारत के सन्दर्भ में । आज के मौजूदा परिदृश्य में समाजवादी (साम्यवादी) राज्य की स्थापना के लिए 1917 के रूस की तुुलना में ज्यादा मुफीद पस्थितियां है। जैसे कि आज हमारे किसान रोज आत्महत्या कर रहें हैं। हिन्दुस्तान डेली के मुताबिक जितनी मौते हमारे जवानों की आतंकवाद और कश्मीर पर सीमा सुरक्षित करने में नहीं हुई उससे ज्यादा जवान नक्सलियों के हाथों मार दिये गये। ये रिकार्ड 2015 में है। 1998 से लेकर 2015 तक लगभग पूरे देश में 12 या 1400000 लाख किसानों ने अपनी आत्महत्या कर ली। अर्थात् कहने का अर्थ यह है कि जो बुनियादी आधार एक वामपंथी राज्य बनाने तथा क्रान्ति के लिए चाहिए वो सब मौजूद है।
अभी सरकार ने जो लेबर कानून पास करने की बात कही है (शायद पास हो गया क्या) उसमें भी मजदूरों को यूनियन बनाने के अधिकार छीनने की बात की जा रही थी जिससे मैं भी सहमत नहीं हूँ। और भी कई क्लाॅज है उस कानून में जो मजदूरों के हित में नहीं है।
अभी सरकार ने जो लेबर कानून पास करने की बात कही है (शायद पास हो गया क्या) उसमें भी मजदूरों को यूनियन बनाने के अधिकार छीनने की बात की जा रही थी जिससे मैं भी सहमत नहीं हूँ। और भी कई क्लाॅज है उस कानून में जो मजदूरों के हित में नहीं है।
अर्थात् मेरी अपने वामपंथी साथियों से अपील है कि फल लटक रहें हैं जल्दी तोडो। फसल पक चुकी है। आप केवल जेएनयू में बैठकर बौद्धिक प्रलाप करेंगें इधर इतनी अच्छी मुफीद परिस्थितियां और क्रान्ति करने के सारे आधार नष्ट हो रहें हैं। सारे किसानों , मजदूरों और नक्सलियों को इकठ्ठा करो और टूट पड़ो मैदान में। लेनिन की तरह । गजब का बन्दा था। उसके बारे में चेम्बेरलेन ने कहा था कि- ’’नेपोलियन के बाद इतिहास का रूख मोड़ने वाला लेनिन जैसा दूसरा कोई नहीं पैदा हुआ।’’
( वैधानिक चेतावनी- कृपया इससे कोई आहत ना हो। और नक्सलियों और किसानो की समस्यायों को लेकर मैं उचित रूप से गंभीर हूँ )
No comments:
Post a Comment