Saturday, March 12, 2016

बस परिप्रेक्ष्य का फेर है।

दुनिया में लगभग एक चैथाई हिस्से पर मुस्लिम आबादी निवास करती है। और जिस तरह से आतंकवाद को मुस्लिम समुदाय से जोड़ने का एक फैशन सा चल पड़ा है उसके पीछे की सबसे बड़ी वजह यह है कि कुछ यूरोपीय देश और अमेरिका इन दोनो ने परिप्रेक्षिक मोतियाबिन्द के हालात पैदा कर दिये है। मतलब अगर अमेरिका में कुछ गोरे लोगों की कोई काला अमेरिकी हत्या कर दे तो यह व्यक्तिगत उन्माद या उस व्यक्ति का पागलपन माना जाता है। अगर कोई गोरा आस्ट्रेलिया या अमेरिका में किसी पंजाबी या भारतीयों के गुरूद्वारे के सामने गोली चला दे यह उसकी व्यक्तिगत समस्या है। वही अगर कोई मुस्लिम यही काम कर दे तो इसे ’आतंकवाद’ कहा जाता है। क्या शिवसेना के इशारे पर उत्तर भारतीयों को मारना आतंकवाद के दायरे में नहीं लाया जा सकता ? दरअसल आतंकवाद की इस धुँधली और पारिभाषिक विदू्रपता का सहारा लेकर मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाया जा रहा इस तथ्य को नकारते हुए कि दुनिया में कितने मुस्लिम डाक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक और पता नहीं क्या-2 होंगे जिसे लोग अपनी नजर में अच्छे कामों मे गिनती करते हैं। इस बात पर बहस छिड़ते ही लोग मध्य एशिया में चल रहे उथल-पुथल को मुस्लिम और इस्लामिक कट्टरवाद की संज्ञा दे देते है। लेकिन यह एक घोर राजनीतिक समस्या है। यह ’सामरिक अर्थशास्त्र’ है जिसे अमेरिका और उसके मित्र देशों ने बड़े करीने से भुनाया है। । लोगों का ध्यान फ़्रांस में मारे गये चंद लोगो पर बड़ी आसानी से चला जाता है लेकिन फिलीस्तीन में मुस्लिमों को रोज मारा जा रहा है उस पर लोंगो का ध्यान नहीं जाता। ध्यान जाता है लेकिन अगर उसकी तरफदारी करेंगें तो सारे विकसित राष्ट्रों की दुश्मनी मोल लेनी पड़ेगी। दुनिया में कौन सा ऐसा देश है जो अपनी जमीन पर जबरदस्ती किसी दूसरी जाति (यहूदी) और देश का अधिग्रहण बर्दास्त करेगा, जैसा कि फिलीस्तीन भी नहीं कर पा रहा है। इससे बड़ा राजनीतिक शोषण इतिहास में नहीं मिलेगा।
अगर लोग यह कहते हैं कि जहाँ मुस्लिम है वहाँ समस्या है तो लोग इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे देशों के बारे में बात क्यों नहीं करते ? ये दोंनो ही समृद्ध देशों की श्रेणी में दिखते हैं। और शिया सुन्नी की बात की जाती है तो इस विवाद को भी इसलिए हवा मिली क्योंकि पश्चिमी देशों ने अपने हित को देखते हुए उसी मुस्लिम समुदाय के एक भाई का साथ दिया और दूसरे भाई के घर का जब चूल्हा नहीं जला और बेरोजगारी झेलनी पड़ी तो अपने भाई के संरक्षक से ज्यादा गुस्सा अपने भाई पर आया क्योंकि यह सब शिया के साथ के हो रहा था सुन्नी लोग पश्चिमी देशों का संरक्षण प्राप्त कर रहे थे।
मुस्लिम समुदाय का वह सारा हिस्सा चाहे फिलीस्तीन हो इराक हो लीबीया हो जब बेरोजगार हो गया और सामाजिक तथा आर्थिक रूप से मुख्य धारा में जब अपने ही देश में वह नहीं आ पाया तो हथियार उठना लाजिमी था।
अन्त में इतना ही कहना है कि जो बुद्धिजीवी मुस्लिम हैं उनकी यह जिम्मेदारी बनती है कि अगर कोई मुस्लिम हिंसा को इस्लाम के नाम पर वैध करार दे रहा है तो उसकी बहुत कठोरपूर्ण निन्दा होनी चाहिए।

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