दुनिया मेरे पीछे पड़ी
पर संग मेरे थी माँ खड़ी
सर पे मेरे रख हाथ वो
कितनी ही रातों को जगी
जो भी मेरे से जब भिड़ा
माँ मेरी उससे लड़ पड़ी
मैं जो गलत भी करता था
उसके लिए था सब सही
एक दिन मुझे पुचकारकर
बोली वो चल नन्हें बड्डी
गिरने से तू डरना नहीं
पीछे हूँ मैं तेरे खड़ी
उसकी इजाजत के बिना
जो कुछ हुआ ना हुआ सही
मैं सोचता हूँ आज भी
माँ थी मेरी कितनी बड़ी
किस्मत मेरी तू ये बता
मेरी माँ छुपा के कहाँ रखी
क्या तुझे भी माँ कमी खली
महसूस मैं करता हूँ जैसे
माँ मेरी है यहीं कहीं
माँ मेरी सबसे बड़ी ।।
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